अपने धर्म की पूजा कीजिये और औरो के धर्म का सम्मान

अपने धर्म की पूजा कीजिये और औरो के धर्म का सम्मान- बलवंत सिंह खन्ना

हमारा संविधान भी यही सिखाता है कि हमें अपने धर्म की पूजा करनी चाहिए और दुसरो के धर्म की सम्मान। अगर समझ सकें तो इस एक लाइन में पूरा सार है। आहे-अगाहे देखने को मिल जाता है कि जब भी किसी धर्म विशेष का कोई त्यौहार होता है तब सोशल मीडिया में ऐसे सन्देश प्रेषित होने लगते हैं जो एक दूसरे के धर्म के प्रति द्वेष उतपन्न करने में मदद करता है। हमे ऐसे सन्देशो को जारी करने से बचना चाहिए। भारत में प्रत्येक धर्म को मानने वाले हैं एवं हमारा संविधान सभी को समान अधिकार प्रदान करता है ऐसे में धर्म विशेष के लिये विवादास्पद सन्देश जारी कर हमे आपसी सद्भाव बिगाड़ना नहीं चाहिए।

बचपन में जब छोटे थे तब मेरे पिता जी कहा करते थे कि बेटा खुद के धर्म की पूजा करना , रक्षा करना और उसका संरक्षण भी करना लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं की दुसरो के धर्म की अवहेलना करना । पिता जी कहते थे कि तुम दुसरो के धर्म,संस्कृति तीज त्यौहार का भी उतना ही सम्मान करना जितना अपने धर्म अपनी संस्कृति के प्रति करोगे। देश में प्रत्येक नागरिक को अपने संविधान के बारे में एवं उससे प्राप्त अधिकारो के बारे जरूर जानकारी होना चाहिए।

          ऐसे भी लोग हैं जो संविधान को ही बदलने की बात अप्रत्यक्ष रूप से करते हैं। संविधान को बदलने की बात हो तो अगर कभी गलती से कोई तानासाह के हाथ में देश की बागडोर चली जाए तो शायद संविधान को ही बदल दे लेकिन लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से यह असम्भव है। हमें खासकर युवाओं को चाहिए कि वह विवेक से कार्य लें अपनी सोच को लोलतंत्रिक ढांचे में ढालें एवं राष्ट्र के विकास हेतु अपना योगदान दें। धर्म आधारित विवादित सन्देश जारी करने से बचे। खुद के धर्म, संस्कृति, तीज त्यौहार की पूजा करें एवं दुसरो की सम्मान।

हमारे संविधान का प्रस्तावना

हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

न्याय, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा,

उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढाने के लिए, दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई0 को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”

संविधान में प्रस्तावना के चार घटक है:-

1. यह इस बात की ओर इशारा करता है कि संविधान के अधिकार का स्रोत भारत के लोगों के साथ निहित है।

2. यह इस बात की घोषणा करता है कि भारत एक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और गणतंत्र राष्ट्र है।

3. यह सभी नागरिकों के लिए न्याय, स्वतंत्रता, समानता को सुरक्षित करता है तथा राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखने के लिए भाईचारे को बढ़ावा देता है।

4. इसमें उस तारीख (26 नवंबर 1949) का उल्लेख है जिस दिन संविधान को अपनाया गया था.

प्रस्तावना के मूल 9 शब्द अगर इनको पढ़कर आत्मसात कर लें तो एयर अधिक समझने की आवश्यकता ही नहीं होगी:- 

•संप्रभुता 

•समाजवादी 

•धर्मनिरपेक्ष 

•लोकतांत्रिक 

•गणराज्य 

•न्याय

•स्वतंत्रता

•समानता 

•भाईचारा 

प्रस्तावना में संशोधन भी हुआ है:-

1976 में, 42 वें संविधान संशोधन अधिनियम (अभी तक केवल एक बार) द्वारा प्रस्तावना में संशोधन किया गया था जिसमें तीन नए शब्द- समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता को जोड़ा गया था। अदालत ने इस संशोधन को वैध ठहराया था।

संविधान में प्रस्तावना को तब जोड़ा गया था जब बाकी संविधान पहले ही लागू हो गया था। बेरूबरी यूनियन के मामले में (1960) सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा नहीं है। हालांकि, यह स्वीकार किया गया कि यदि संविधान के किसी भी अनुच्छेद में एक शब्द अस्पष्ट है या उसके एक से अधिक अर्थ होते हैं तो प्रस्तावना को एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।

केशवनंद भारती मामले (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के फैसले को पलट दिया और यह कहा कि प्रस्तावना संविधान का एक हिस्सा है और इसे संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संशोधित किया जा सकता है लेकिन इसके मूल ढांचे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है. एक बार फिर, भारतीय जीवन बीमा निगम के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि प्रस्तावना संविधान का एक हिस्सा है।

इस प्रकार स्वतंत्र भारत के संविधान की प्रस्तावना खूबसूरत शब्दों की भूमिका से बनी हुई है। इसमें बुनियादी आदर्श, उद्देश्य और दार्शनिक भारत के संविधान की अवधारणा शामिल है। ये संवैधानिक प्रावधानों के लिए तर्कसंगतता अथवा निष्पक्षता प्रदान करते हैं।

कल 25 दिसम्बर ईसाई धर्म का सबसे बड़ा त्यौहार क्रिश्मस में अगर आप ईसाई धर्म से नहीं हो तो उनके धार्मिक त्यौहार का सम्मान कीजिये। आप उनके त्योहार में शामिल नहीं हो सकते हैं तो उनके खिलाफ विवादस्पद सन्देश भेजने का भी आपको कोई अधिकार नहीं है। 

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