आकर्षण का सिद्धांत, सकारात्मक सोच के लिए

आकर्षण का सिद्धांत, सकारात्मक सोच के लिए

वर्षो पहले की बात है जब पिता जी शौकिया तौर पर नाटक,गम्मत में भाग लिया करते थे तब पिता जी कहानिया भी लिखा करते थे । hb और उन कहानियो का नाटकीय मंचन भी किया करते थे। ऐसे ही किसी समय जब पिता जी नाटक में हिस्सा लेने अन्य गांव गए हुए थे पूरी रात गम्मत और नाटक मंचन के बाद प्रातः गांव से वापस जाने का समय हुआ तब पता चला उस गांव में किसी घर में एक वयस्क पर चुड़ैल(उस समय ग्रामीणों में कुछ जगह भूत-प्रेत की मान्यताएं होती थी ) समा गई है। गावँ वालो को किसी ने बताया था की पिता जी औषधीय जानकारी भी रखते हैं तब उन लोगों ने पिता जी के पास  मदद के लिए आए। जब पिता जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने सोचा जाने से पहले उस व्यक्ति से मुलाकात करना चाहिये और पिता जी अपने पूरे नाटक मण्डली के साथ उस व्यक्ति के घर पहुच गए। वहाँ उन्होंने देखा की 30-35 वर्ष का एक युवा  बदहवास हालात में है और अजीबो-गरीब हरकतें कर रहा है। पिता जी उस व्यक्ति को अच्छे से देखने के बाद उनके घर वालों को बोले कि आपके घर में कोई बाड़ी(साग सब्जी लगाने वाली जगह) है? घर वाले पिता जी को अपने बाड़ी में लेकर गए। पिता जी ने वहां से कुछ जड़ी बूटी खोजकर निकाले और पानी में अच्छे से धोकर उस उस व्यक्ति के परिजन को बोले की इसको अभी खिला दो। खूब चबाकर खाने को कहें  और अगले 3 दिनों तक सुबह सुबह खाली पेट ही खिलाना है। 4थे दिन से ही आपका लड़का ठीक हो जायेगा और कोई भी चुड़ैल पास नहीं फटक सकेगी। गांव वालों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन लोगों ने देखा कि  पांचवे रोज तक वह व्यक्ति पूर्ण रूप से ठीक हो चुका है और उस व्यक्ति के घर वालो ने पिता जी  a धन्यवाद व्यक करते हुए खबर भिजवाया  कि आपके इलाज से हमारा बेटा अब स्वस्थ है। 

            पिता जी ने एक दिन ऐसे ही परिवार के बीच बैठकर इस घटना के बारे में चर्चा करते हुए  बताया  कि मैंने उस व्यक्ति को कोई औषधीय जड़ी बूटी नहीं दिया था । जब मैंने देखा की उस व्यक्ति के अंदर एक अदृष्य डर समाया हुआ है जिससे वह बार बार खुद को खो देने या किसी के द्वारा नुकसान पहुचाये जाने का डर उसे सताने लगता है।  इस कारण से ही वह बदहवास  सा हो  रहा था और उस समय परिजनों को ऐसा लगता है मानो  कोई चुड़ैल आदि का साया उसपर हावी है। (पिता जी इस तरह के अन्धविश्वास को नहीं मानते थे)।  पिता जी आगे बताते हैं की मैंने उस व्यक्ति को उनके घर के बाड़ी से दुबी( एक प्रकार का घास है जिसे पूजा के समय उपयोग किया जाता है)

की जड़ निकाल कर खिलाने बोला और अगले 3 दिन के लिए भी निकाल कर दे दिया। तब हमने पूछा की वह व्यक्ति केवल दुबी का जड़ खाकर कैसे ठीक हुआ तब पिता जी ने बताया कि वह व्यक्ति दुबी की जड़ से ठीक नहीं हुआ बल्कि वह खुद की इच्छाशक्ति से ठीक हुआ ।उसके शारीर में जब सकारात्मक सोच का संचार होने लगा तब वह स्वतः ही ठीक होते गया और दोबारा कभी वैसी समस्या ही नहीं आई। एक बार उस जड़ी को खाने के बाद उसके मन से डर खुद ही गायब हो गया था और अब वह सोचने लगा था की मैंने दवाई ले ली है अब मैं ठीक हो जाऊंगा। बस इसी सकारात्मक सोच ने उसको ठीक कर दिया।

कहानी का सार यह है कि पिता जी हमें आकर्षण का सिद्धांत सिखाना चाह रहे थे कि जब आप किसी चीज को अपनी ओर आकर्षित करते हो तो उसे कैसे पा सकते हो। आप खुद को बीमार मत मानो, अच्छा सोचो अच्छा करो अच्छे विचारों को आकर्षित करो तब देखना आपके साथ स्वतः ही सब अच्छा होने लगेगा। 

यही स्थिति आज सभी के साथ हैं विश्वव्यापी कोरोना महामारी से लड़ने के लिए मानसिक मजबूती बहुत जरुरी है। अगर आप अपने मन से मजबूत होंगे तो रोगप्रतितोधक क्षमता स्वतः ही मजबूत रहेंगी जिससे संक्रमण को अपने शारीर के अंदर प्रवेश होने का मौका ही नहीं मिलेगा। 

पिता जी आप बहुत याद आते हैं। आपने हर पल हमें अच्छी शिक्षा दी। आज आपकी १४वीं पुण्यतिथि पर आपको सादर नमन🙏🏻🙏🏻💐💐

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