हर व्यक्ति को जीवन में कभी न कभी अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए उधार लेना ही पड़ता है। उधार लेने से न सिर्फ लोगों के साथ हमारा रिश्ता खराब होता है बल्कि परमेश्वर के साथ भी हमारा रिश्ता खराब हो सकता है। यह सच है कि कर्ज़ अक्सर रिश्तों में दरार डाल देता है। जब कर्ज़ चुकाने की बात आती है तो बड़ी-से-बड़ी योजनाएँ और नेक इरादे भी नाकाम हो सकते हैं। मिसाल के लिए, अगर सही वक्‍त पर पैसा न लौटाया जाए और कर्ज़ चुकाने में देरी होती जाए तो उधार देनेवाला हमसे नाराज़ हो सकता है। उसके दिल में कड़वाहट आ सकती है और दोनों का रिश्ता बिगड़ सकता है, यहाँ तक कि उनके परिवारों के बीच तनाव बढ़ सकता है। 

बचपन के समय एक ग्रामीण परिवेश में जो इच्छाएं होती या जो मांगते पिता जी पूरा कर देते तब हमारी इच्छाएं और इच्छाओं तक हमारी पहुंच भी कम थी बचपन में जब पिता जी अट्ठन्नी या 1 रूपया भी दे दे तो मानो ख़ुशी सातवे आसमान पर पहुंच जाती थी। अपने जीवन में 5 पैसे से लेकर भारतीय मुद्रा की सबसे बड़ी नोट 1000 एवं 2016 के बाद 2000 रूपये का नोट देखा है। उम्र लगभग साढ़े 17 वर्ष साल 2007 स्कूल में 12वी की परीक्षा उत्तीर्ण और अचानक जब पिता जी की मृत्यु हुई तब अहसास हुआ कि पैसों की क्या अहमियत होती है उससे पहले तो  कभी अहसास ही नहीं हुआ कि अमीरी-गरीबी जैसी भी कोई चीज होती है। मुझे याद है जब पिता जी हमें इस दुनिया में अकेले छोड़कर गये उस समय उनके कमीज के जेब में 1000-1000 रूपये के दो कड़कड़ाती नोट थे उन दोनों नोट को मैंने सम्भालकर अपने बटुए में रखे रहे, कुछ वर्षो बाद बटुए से नोट अचानक गायब भी हो गये तब लगा शायद पिता जी ले गए, तत्कालीन समय में भारतीय मुद्रा की सबसे बड़े नोट जो बाजारों में उपलब्ध थी वह हजार रूपये के  ही थे लेकिन इन बड़े नोट के मेरे लिए कोई मायने नहीं थे क्योंकि जो ख़ुशी हमें पिता जी द्वारा अठन्नी देने पर होती थी वो ख़ुशी अब हमें जीवन भर कभी नहीं मिलने वाली थी। कहते हैं गांवों में केवल नमक को बाहर से खरीदने की परम्परा रही है उसको छोड़कर घरेलु जरुरत की सामान्य सभी वस्तुओं का उत्पादन एवं निर्माण गांवों में ही हो जाता था लेकिन समय के साथ लोगों की आवश्यकता एवं जरूरतों में भी बदलाव आये हैं।

घर में 4 बच्चे 2 बड़ी दीदी और एक छोटा भाई बीच का मैं। पारिवारिक पृष्टभूमि अच्छी रहने की वजह से पढ़ाई नहीं छूटी, 12 वी के बाद ही शहर का रुख कर लिए और सीधा राजधानी होते हुए लौह धानी (भिलाई) पहुंच गए। अपने कुछ गलत फैसले एवं कुछ गलत नीति के वजहों से मैं बहुत ज्यादा कर्ज से ग्रसित भी हुआ। कई बार अपने से बड़ो एवं कई बार अपने से छोटो से भी उधर लिए कुछ ब्याज में लिए तो कुछ व्यवहार में लिए। जिनसे ब्याज में लिए उनसे भी सम्बन्ध ख़राब किये एवं जिनसे व्यवहार में लिए उनसे दोबारा सम्बन्ध सुधार न सकें। ईमानदारी से यथासम्भव उधारी चुकाने का प्रयास किये और चुकाए भी जो अति बलशाली रहें उनको पहले लौटाए और जो अति करीबी रहें उनकी उधारी आज पर्यन्त तक बची हुई हैं। इस बीच कई बार ऐसा समय आया जब यह अहसास हुआ कि लोग उधारी के कारण आत्महत्या तक कैसे कर लेते हैं। लेकिन अपनी आशावादी सोच के बुते मैं कभी कमजोर नहीं हुआ न कभी डगमगाया। मुझे लगता है जीवन में अगर कोई सबसे कठिन काम है तो वह काम किसी से उधार मांगना ही है। जिनसे हम उधार मांग रहे होते हैं वह उम्र में हमसे बड़े हो सकते हैं छोटे हो सकते हैं अमीर हो सकता है सामान्य हो सकता है लेकिन एक चीज है जो वो होता ही है और वह है हमसे महान।

कहते हैं कि जब बिजली गुल हो जाती है और सभी तरफ अँधेरा छा जाता है तब हमें मोमबत्ती की याद आती है ठीक उसी तरह हम जिनसे उधारी मांग रहे होते हैं वो भी हमारे जीवन में एक मोमबत्ती की तरह होता है जो हमारे जीवन में उजाला ला सके। 

जब कोई आपसे उधारी मांगे तो समझ लीजियेगा की आप उनके नजर में उस लायक हो कि आप उनकी मदद कर सकते हो और सामने वाले व्यक्ति ने खुद को कितना मजबूत किया होगा आपसे मदद मांगने के लिए l  आप उनसे उम्र में छोटे भी हो सकते हो या आपकी आमदनी कम हो लेकिन उसने आपको अपनी  मोमबत्ती समझकर आपसे मदद मांगी है। जब सभी तरफ अँधेरा दिखाई दिया तब उसने आपको याद किया इस बात में कोई दो राय नहीं कि अगर आप उनको उधार देते हो तो निश्चित ही आप खुद को जलाकर उनके जीवन में उजाला कर रहे हो। उधारी देना या लेना दोनों ही गलत है बोल सकते हो लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से यह मानता हूँ की इसके लिए हमें बहुत बड़ा बनना होता है अंदर से।

आज भी मेरी उधारी हैं वर्तमान में  जिनकी उधारी हैं वो मेरे अपने हैं जिनको समय पर चुकाना मेरी नैतिक जिम्मेदारी भी है। मैंने कुछ उधारी ली है तो कुछ उधारी दिए भी हैं जिनको दिए उनसे मैंने कभी तगादा नहीं किया न कभी हिम्मत हुई। लेकिन एक बार जिनको दिया उनको बिना वापस लिए दोबारा नहीं दिया। इन सब में मेरे कई खास सम्बन्ध ख़राब भी हुए जिसका दुःख मुझे हमेशा से है लेकिन यकीन मानो यह मात्र पारिस्थितिक निर्मित है।

किसी ने कहा है कि

“उधार लेना शादी से मिलने वाली खुशी जैसा है, 

मगर उधार चुकाना शोक या मातम मनाने जैसा।”

लेकिन मैं मानता हूँ 

“उधार लेना बच्चे का बाप बनने जैसा है 

और उधार चुकाना मतलब बच्चे को पाल पोसकर काबिल बनाने जैसा है।”

अर्थात जब आप पिता बनते हो तब से आप उसके भरण पोषण के लिए उत्तरदायी होते हो और जब आप उधार चुकाते हो तब आप बच्चे को एक काबिल इंसान बना चुके होते हो। 

उधार देने वाला अगर उदार हो तो लेने वाला भी ईमानदार हो।

उम्मीद है उधार के चक्कर में हम न तो अपनी जीवन लीला को समाप्त करें और न ही अपने मधुर सम्बन्धो को

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6 thoughts on “उधार (कर्ज)

  1. भाई साहब मैंने में गृह ऋण (उधार) लिया हुआ है।बैंक वाले बिना तकादा किए हर मैंने पैसे काट देते है।

  2. वाह भैया बहुत ही शानदार,
    मैने भी कई बार उधारी ली है और उस समय को भी देखा जब आशा की किरण कुछ कम होने लगती है, पर उस आशावादी किरण के कारण ही मैने भी सकुशल रहकर सभी उधारी वापस की है।

  3. आपकी शब्दो ने मेरे दिल की गहराइयों को छु लिया मेरे दोस्त लेकिन समय के आगे किसकी चली है यह तो एक जीवन की प्रक्रिया में है जो सभी के साथ होता है।

  4. बहुत खूब । अस्सी के दशक वाले हर बच्चे की यही कहानी है । हमारा भी एक आदर्श पिता के हाथो परवरिश हुवा है , जो कहा करते थे मेरी बेटियों को जो आज पैसा दे रहा हूँ , वो मैं अपने पिछले जन्म का उधार चुका रहा हूँ । सुप्रभात । 💐

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