चिंतन
अभी पिछले ही सप्ताह मेरे साथ दो वाक्या हुआ जिससे मैं खुद के बारे चिंतन करने ने मजबूर हुआ और आज इसपर लिखने से खुद को रोक नहीं पाया
तो जिक्र करते हैं पहले वाक्ये की 4  रोज पहले की बात है मेरी धर्मपत्नी की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी और मैं उनको लेकर पास के ही उपस्वास्थ्य केंद्र गया जहा की स्टाफ नर्स रिश्ते में मेरी भाभी लगती हैं। वहां  मुझे अपनी पत्नी को बस एक इंजेक्शन लगवाना था मैं  अपनी पत्नी को अस्पताल में छोड़कर आगे मेडिकल स्टोर गया इंजेक्शन लाने के लिये मेडिकल में उस इंजेक्शन की मूल्य 204 रूपये मात्र थी कुछ पल के लिये सोचना पड़ा की इतना महंगा और मेरे जेब में उस वक्त मात्र 500 रूपये ही थे (चूँकि 2019 मेरे  लिये आर्थिक मामले में उतना खास नहीं है फिर भी हम रूखी सुखी ही सही लेकिन अपने वर्तमान जीवन और जीवन शैली से खुस हैं और ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं) मैंने इंजेक्शन लिया फिर सीधा अस्पताल आया वहाँ अपनी पत्नी को इंजेक्शन लगवाये फिर कुछ देर रूककर वापस अपने घर के लिये निकल गए  रास्ते में एक जगह रुककर मस्त नीबू पानी पीकर सूखे गले को तर भी किये। यह रहा पहला वाक्या…
   फिर आते हैं दूसरे वाक्ये में तो बात ऐसी है की मैं 2  दिन पहले ही अपने एक खास मित्र से मिलने गया जिसको बाजार( शहर) में कुछ काम था सूबेह 11 बजे से मैं  उसके साथ था जैसे बाजार पहुँचे वहाँ मेरे मित्र के एक और मित्र से मुलाकात हुई (जो सीधे तौर पर मेरे मित्र नहीं हैं। ) अब हम तीनो एक साथ निकले मैं तो अब अकेले कार के पीछे सीट में बैठा रहा और बाकि दोनों मित्र अपनी काम के सिलसिले में बात करने लगे फिर कुछ देर बाद उन्होंने  एक बीयर बार में गाड़ी रोकी और उन दोनों के साथ में हम भी बार में घुस लिये वहाँ अंदर जाकर उन दोनों ने 1-1 बीयर लिये कुछ सिगरेट लिये और मैंने एक मिनरल वाटर( खनिज जल) पीये लगभग 1 घण्टा बाद वेटर ने मेरे मित्र को  बील दिया जिसमें 870 रूपये अंकित थे उन दोनों मित्र में एक ने 500 रूपये और एक ने 400 रूपये निकालकर वेटर को दे दिये और 870 में से बाकि का पैसा वेटर को टिप के रूप में देकर हम तीनो वह से निकल गये। वो दोनों तो अपने में मस्त थे लेकिन मैं मन ही मन 4 दिन पहले अपने पत्नी के साथ अस्पताल वाली बात को सोचता रहा की कैसे मुझे 204 रूपये की इंजेक्शन के लिये भी सोचना पड़ा जो बहुत जरुरी है। लेकिन यहाँ पर मेरा मित्र 870 रूपये का ऐसे ही बे मतलब का कुछ घंटो में ही उड़ा  दिया जिसका कोई मतलब ही नहीं।
फिर बाद में मैंने अपने मित्र से इस बारे में चर्चा किया की यार 4 दिन पहले मेरे पास अपनी पत्नी के इलाज हेतु पैसे कम पड़ रहे थे जो की जरुरी था और मैंने उसको पूरा भी किया।
लेकिन अभी आप लोगो को देखा की आप लोग बिना मतलब के भरी दोपहरी में 870 रूपये ऐसे ही उड़ा दिये ऊपर से स्वास्थ्य में जो नकारत्मक प्रभाव पड़ेगा ओ अलग। तब मित्र ने मुझे एक अच्छा शब्द बोला की किस्मत या कहे भगवान भीं फालतू का लत या आदत उसी इंसान को देता हैं जिसे आर्थिक रूप से कोई प्रभाव न पड़े। तब मुझे अहसास हुआ 14 वर्ष घर से दूर रहने के बाद भी नशा(शराब) को आजतक हाथ क्यू नहीं लगाया या मेरी रूचि क्यू नहीं हुई।
शराब  नहीं पिने से मैं कोई महान इंसान हूँ ऐसा भीं नहीं है मैंने भी जाने अनजाने में अनेक गलतिया की है अपने परिवार वालो को कई बार दुःख दिया है, गलतिया किया है लेकिन इतना तो है की नशा के क्षेत्र में मैं हमेशा अपनी माँ से अपनी बहनो से अपने भाई से अपनी बीवी से नजरे मिलाकर कह सकता हूँ की हाँ मैंने इस क्षेत्र में कभी कोई गलती नहीं की है। इंसान को सही या गलत आदत की लत खुद की सोच और परिस्थिति दोनों ही सिखाती है। अगर हमारी सोच मजबूत हो तो चाहे जैसी भीं परिस्थिति हों हमारी कदम गलत राह में कभी नहीं जायेगी यह बात हर उस इंसान को सोचना चाहिये चिंतन करना चाहिये जो जाने अनजाने में कोई गलती करते हैं जिससे वह खुद से और अपने परिवार वालो से नजर चुराता है।
                                                                                   © एम बी बलवंत (स्वतन्त्र लेखक)

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