नेकी कर दरिया में डाल

नेकी कर दरिया में डाल
एक बहुत ही मशहूर कहावत है नेकी कर दरिया में डाल। इस कहावत को हर कोई अपने जीवन में कभी न कभी सुना या पढ़ा जरूर होगा। नेकी अर्थात भलाई अथवा पुण्य का ऐसा कार्य जो किसी की सहायता के लिए किया गया हो और दरिया का आशय है नदी का बहाव। आप कह सकते हैं कि एक तरह से नेकी कर दरिया मे डाल दिया जाए। इसका अर्थ होता है कि पुण्य करने के बाद मन में जो विचार उत्पन्न होता है कि मैंने किसी की मदद की या मैंने पुण्य का काम किया है। ऐसे विचारों से बचना चाहिए क्योंकि इस विचार से मन में अहंकार की उत्पत्ति होती है और ऐसा होने पर फिर वह नेकी के दायरे से हटकर अपनी पीठ स्वयं थपथपाने के समान हो जाता है। इसी लिए कहा जाता है कि नेकी कर दरिया में डाल।
आज हर व्यक्ति स्वयं के द्वारा किसी इंसान के लिए की गई किसी भी प्रकार की मदद या सहानुभूति के कार्य से खुद को मालिक समझ बैठता है। कई बार हमें ऐसे लोग भी मिलते हैं जो हर अच्छे कार्य का श्रेय तो खुद लेना चाहते हैं और हर बिगड़े कार्य को दूसरे के मत्थे जड़ना चाहते हैं। ऐसे व्यक्ति आपको अपने आस पास ही मिल जाएंगे फिर चाहे वह आपका कार्यस्थल हो, पारिवारिक या सामाजिक दायरा हो अथवा राजनैतिक क्षेत्र। कुछ लोग इतने अवसरवादी मिलेंगे जो चिकनी चुपड़ी बातो से ऐसी मीठी छुरी चलाते हैं मानो उसके समान हमदर्द इंसान इस दुनिया में कोई हैं ही नहीं । लेकिन सच्चाई तो यह है कि जब वास्तविक रूप में किसी को सहायता की जरूरत होती हैे तो इस प्रकार के इंसान सबसे पहले दुम दबाकर भागते मिलते हैं ।
कोई भी कार्य चाहे मदद के उद्देश्य से हो या कर्तव्यबोध से, मुझे लगता है अहसान लेने की बात ही दिमाग में नहीं आनी चाहिए।
नेकी कर दरिया में डाल को जितना मैंने अपने जीवन में समझा है उससे मुझे इसका अर्थ समझ आता है कि आपके द्वारा की गई सहायता का श्रेय लेने के लिये आप मत भागो, इस सोच को दरिया में डाल दो जब आप दरिया में डालो तो वह नेकी इतनी हलकी हो कि दरिया में खुद ही ऊपर तैरने लगे अर्थात आपके द्वारा किये गए सद्कार्य के लिए आप में कोई भी घमंड न हो और वह इतनी हलकी हो कि जल के ऊपर तैरती हुई हर किसी को स्वतः ही दिखाई दे।
दरिया का उल्लेख का आशय मैं समझता हूँ जिसमे हर हलकी वस्तु तैरने लगती है।
जब आप ऐसा करते हैं तो आपके द्वारा की गई अच्छाईयां लोगों को स्वतः ही दिखने या समझ आने लगती है। अपने द्वारा किये गए पुण्य कार्य पर कभी घमण्ड नहीं हो और खुद की गलती पर कभी छिपना नहीं चाहिये।
अगर अच्छा कार्य कर रहे हैं तो वह लोगो को स्वतः दिखने लगेगा। प्रकृति में इतनी ताकत है कि आपकी अच्छाईयों का फल वह आपको अवश्य देगी भले ही किसी वजह से उसमें विलंब हो जाए पर फल प्राप्ति में संदेह नहीं। अगर किसी कारणवश आपसे कुछ कार्य गलत हो गया हो तो उस गलती को स्वीकार करते हुए उसको सुधारने के लिए भी पहल करना चाहिए। एक कहावत है कि यदि हम अपेक्षा करते हैं कि लोगों से हमें सम्मान मिले तो सबसे पहले हमें लोगों का सम्मान करना चाहिए। यह संसार की रीति है, एक हांथ दे और दूसरे हांथ ले। इसी प्रकार हमें भी दूसरों से सहायता तभी मिल सकती है जब दूसरों की सहायता करने की हमारी प्रवृत्ति हो। यही प्रवृत्ति मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी होने का द्योतक है और यही जीवन का सार है।

Related Posts

One thought on “नेकी कर दरिया में डाल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *