‘लंका मा सोन के भूती’

अभी 32 वर्ष की उम्र हो रही है जिसमें मैने लगभग 16 वर्ष मैं गांव और परिवार से दूर ही बिता दिया है। वर्ष 2005 में पढ़ाई के लिए पहली बार जब घर से बाहर निकला तब प्रत्येक शनिवार और रविवार को घर जाया करता था। जब महाविद्यालय में पंहुचा तब माह में 2 बार जाना हो पाता या किसी माह तो केवल एक ही बार जाना हो पाता था। पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार मिला विवाह हुआ और खुद पिता बन चुका हूँ। अब स्थिति ऐसी है कि केवल त्योहारो पर ही घर जाना हो पाता है।  इस साल गांव में दीवाली मनाकर 2 दिन बाद ही वापस काम पर लौटना पड़ा जब घर से  निकल रहा था उस समय माँ दरवाजे पर खड़ी काफी देर जब तक कि मैं उनकी नजरो से ओझल नहीं हुआ, तब तक मुझे निहारती रही। वह समय मेरे लिये बेहद नाजुक पल था जो मायूसी, उदासी और वात्सल्य व ममता का मिलाजुला स्वरूप  प्रतिविंब लग रहा था। ऐसा वाक्या अमूमन सभी ग्रामीण परिवारो के साथ होता है जिनके बच्चे एक अच्छे कल की तलाश में अपनों को छोड़कर दूर शहरो का रुख कर लेते हैं जिसे हम पलायन कहते हैं आज मैं इसी विषय पर लेख लिखने का प्रयास किया है।

                        ‘लंका म सोन के भूती‘

हमारे यहाँ छत्तीसगढ़ी में एक कहावत है ‘लंका म सोन के भूति‘ अर्थात अपने गाँव, शहर या देश से दूर रोजगार में सोने के बराबर मजदूरी मिलना। गांव से लोग जब पलायन कर शहरों की ओर रुख करते हैं, तब वहाँ के बड़े बुजुर्ग अक्सर यह कहते हुए पलायन करने से रोकने का असफल प्रयास करते हैं कि बेटा अपनी जमीन या अपने देश को छोड़ कर कुछ अतिरिक्त पैसो की चाह में तुम दूर जा रहे हो, वहाँ  पैसे भले ही ज्यादा कमा लोगे लेकिन बेटा अपनों का प्यार कहा से लाओगे? गांव में भले ही रूखी सूखी मिले, लेकिन यहाँ सब अपने हैं जो  सुख-दुःख में हमेशा साथ खड़े मिलेंगे। लंका (दूर स्थान) में कौन होंगे पूछने वाले? सच्चाई  भी यही है। पलायन वर्षों से और अनेक रूपो में श्रम और प्रतिभा पलायन के रूप में समय समय पर इसका स्वरूप बदलते गया है। भले ही इस तरह के पलायन का स्वरूप कुछ भी रहा हो पर ज्यादातर पलायन मुख्य रूप से आर्थिक लाभ पाने और बेहतर जीवन स्तर की लालसा की पूर्ति के लिए ही होते रहे हैं। दूसरे शब्दों में इसे हम श्रम पलायन भी कह सकते हैं।

उच्च शिक्षित वर्गो में यह पलायन ज्यादा पाया जाता है। प्रतिभा अर्थात पेशेवर लोग जैसे की डॉक्टर, अभियन्ता, वित्तीय प्रबंधनकर्ता, वकील अथवा विभिन्न व्यवसायों से जुड़े व्यक्तियों का अपने देश को छोड़कर दूसरे देशो में जाकर बस जाना या प्रवासी रूप में कार्य करना ही प्रतिभा पलायन कहलाता है। इसी कड़ी में एक वर्ग ऐसा भी रहा है जो पहले तो उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए अन्य देशों में गया और बाद में वहीं का होकर रह गया।  इसका सबसे अहम उदाहरण हैं अल्बर्ट आइंस्टीन जिन्होंने वैज्ञानिक खोजों में पूरी दुनिया को नई दिशा प्रदान किया है। नाजी उत्पीड़न से बचने के लिए आइंस्टीन ने अमेरिका की ओर प्रस्थान किया था। सन 2000 में किए गए एक सर्वे के अनुसार लगभग 175 मिलियन लोग (दुनिया की लगभग 2.9 प्रतिशत आबादी) अपने आवासीय देश से बाहर रहते हैं, जिनमें से 65 मिलियन लोग आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रवास 1940 के दशक में पहली बार चिंता का कारण बना जब हजारों लाखों यूरोपीय पेशेवरों ने अपना घर छोड़कर इंग्लैंड तथा अमेरिका की ओर प्रस्थान किया। 1970 में हुए एक शोध के अनुसार विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक रिपोर्ट जारी किया था जिसमें मुख्य रूप से प्रतिभा पलायन का रूख दर्शाया गया था, रिपोर्ट के अनुसार 90 प्रतिशत प्रवासी मुख्य रूप से 5 देशों की ओर ज्यादा पलायन कर रहे थे, यह देश थे ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, इंग्लैंड, अमेरिका तथा जिन देशों से लोग पलायन कर रहे थे उनमें सबसे अधिक एशियाई देश थे जैसे भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, चाइना, आदि। अगर कहा जाय कि विगत दो वर्षों में भारत में कोरोना वायरस को प्रवेश कराने के लिए यही वर्ग प्रमुख रूप से जिम्मेदार रहा है तो गलत नहीं होगा। चीन के वुहान नामक शहर से निकलकर पुरे विश्व में मृत्यु का तांडव मचाने क लिए जिम्मेदार कोरोना वायरस ने ऐसे लोगो के ही माध्यम से हमारे देश में प्रवेश किया है जो विदेशों से घूमकर वापस हमारे देश आये हैं।

             सुविधाओं के अभाव और बेहतर जीवन स्तर की प्रत्याशा में वह हर व्यक्ति इसके लिए जिम्मेदार है जो अपने जल, जंगल, जमीन और अपने लोगो को  छोड़कर ‘लंका में सोन की भूती‘ के लालच में पलायन करता है। सुखद बात है कि आज हर राज्य सरकार अपने लोगांे की बेहतरी के लिये अनेक योजनाएं संचालित कर रही हैं ताकि पलायन श्रम पलायन को रोका जा सके और कौशल संवर्धन का प्रशिक्षण प्राप्त कर वहां के लोग अपने क्षेत्र में ही रहकर अपनी आजीविका चलाते हुए बेहतर जीवन जी सकें। लेकिन फिर भी देखा जाता है कि ज्यादा की चाहत में लोग पलायन करने को आतुर हो जाते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हमारे देश की कुल जनसंख्या 121.02 करोड़ आंकलित की गई और उसमें से 68.84 प्रतिशत लोग गांवों में और 31.16 प्रतिशत लोग शहरों में निवास करते हैं। स्वतंत्र भारत की प्रथम जनगणना 1951 में हुई जिसके अनुसार ग्रामीण एवं शहरी आबादी का अनुपात 83 एवं 17 प्रतिशत था। 50 वर्षों बाद 2001 की जनगणना में ग्रामीण एवं शहरी जनसंख्या का अनुपात बदलकर 74 एवं 26 प्रतिशत हो गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारतीय ग्रामीण लोगों का पलायन शहरों की ओर तेजी से बढ़ रहा है।

             गांवों से शहरों की ओर पलायन का यह सिलसिला कोई नया मसला नहीं है। लगातार बढ़ रही जनसंख्या, लगातार हो रहे संयुक्त परिवारों के विघटन और नित नए उद्योगों की स्थापना के परिणामस्वरूप गांवों में  कृषि योग्य भूमि के रकबे में लगातार हो रही कमी, कुटीर उद्योगों का बंद होना, भूमिहीन मजदूरों के सामने राजी-रोटी की समस्या के कारण काम काम की तलाश में भटकना, साहूकारों के कर्ज के बोझ से छुटकारा पाने की चाह में ग्रामीणों का शहरों-कस्बों की ओर रूख करना ही श्रम पलायन के प्रमुख कारण बने। गांवों में बुनियादी सुविधाओं की कमी भी पलायन का एक दूसरा बड़ा कारण है। गांवों में रोजगार और शिक्षा के साथ-साथ बिजली, आवास, सड़क, संचार, स्वच्छता और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं शहरों की तुलना में बेहद कम है। इन बुनियादी कमियों के साथ-साथ गांवों में भेदभावपूर्ण सामाजिक व्यवस्था के चलते शोषण और उत्पीड़न से तंग आकर भी बहुत से लोग शहरों का रुख कर लेते हैं।

                 मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करने के प्रयास मंे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर रहना ही पलायन कहलाता है। लेकिन ऐसे पलायन की प्रवृत्ति कई रूपों में देखी जा सकती है जैसे एक गांव से दूसरे गांव, गांव से नगर, नगर से नगर और नगर से गांव। परन्तु भारत में “गांव से शहरों” की ओर पलायन की प्रवृत्ति कुछ ज्यादा है। एक तरफ जहां शहरी चकाचैंध और व्यस्ततम जिन्दगी का आलम दिखाई पड़ता है तो दूसरी ओर स्थापित हो रहे अनेक उद्योगों, कार्यालयों तथा विभिन्न प्रतिष्ठानों में रोजगार प्राप्ति की लालसा युवाओं को शहरों की ओर खींच रही हैं। शहरों में अच्छे परिवहन के साधन, शिक्षा केन्द्र, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं तथा अन्य बेहतर सेवाओं ने भी गांव के युवकों, महिलाओं को आकर्षित किया है। वहीं गांव में विद्यमान रोजगार की अनिश्चितता, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने लोगों को पलायन के लिए प्रेरित किया है।

                 सरदार बल्लभ भाई पटेल ने एक बार कहा था कि “पंचायत संस्थाएं प्रजातंत्र की नर्सरी हैं। हमारे देश या प्रजातंत्र की विफलता के लिए सर्वप्रथम दोष नेतृत्व को दिया जाता है। पंचायतों में कार्य करते हुए पंचायत प्रतिनिधियों को स्वतः ही उत्तम प्रशिक्षण प्राप्त हो जाता है जिसका उपयोग वे भविष्य में नेतृत्व के उच्च पदों पर कर सकते हैं।” पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने एक बार कहा था कि “हमारी योजनाओं का केवल 15 प्रतिशत धन ही आम आदमी तक पहुंच पाता है।” देश के किसी गांव में दिल्ली से भेजा गया एक रुपया वहां पहुंचते-पहुंचते 15 पैसा हो जाता है। यह ऐसा क्यों होता है? शेष 85 पैसे कहां चले जाते हैं? इसका एक ही जवाब है कि वह राशि भ्रष्टाचार रूपी मशीनरी द्वारा हजम कर ली जाती है। राजनैतिक नेतृत्व की शुरुआत पंचायत स्तर से होनी चाहिए। सरदार पटेल, पं. जवाहरलाल नेहरु तथा गोविन्द बल्लभ पंत आदि केन्द्रीय सरकार में आने से पूर्व नगरपालिकाओं के मेजर या अध्यक्ष रह चुके हैं। ग्रामीणों का शहरों की ओर पलायन रोकने और उन्हें गांव में ही रोजगार मुहैया कराने के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों की ओर से विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। भारत में ग्रामीण विकास मंत्रालय की प्रथम प्राथमिकता ग्रामीण क्षेत्र का विकास और ग्रामीण भारत से गरीबी और भूखमरी हटाना है। ग्रामीण क्षेत्रों में गांवों और शहरों के अन्तर को कम करने, खाद्य सुरक्षा प्रदान करने और जनता को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सामाजिक और आर्थिक आधार पर लोगों को सुदृढ़ करना जरूरी है। 

“महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना” 2 फरवरी, 2006 को देश के 200 जिलों में लागू होने के बाद पंचायती राज व्यवस्था काफी सुदृढ़ हुई है। सबसे ज्यादा फायदा यह हुआ है कि ग्रामीणों का पलायन रुका है। लोगों को घर बैठे काम मिल रहा है और निर्धारित मजदूरी (202 रुपये वर्तमान में) भी। मजदूरों में इस बात की खुशी है कि उन्हें काम के साथ ही सम्मान भी मिला है। कार्यस्थल पर उनकी आधारभूत जरूरतों का भी ध्यान रखा गया है। उन्हें यह कहते हुए प्रसन्नता होती है कि “अब गांव-शहर एक साथ चलेंगे, देश हमारा आगे बढ़ेगा।”

पूर्व राष्ट्रपति एवं मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम कहा करते थे कि “शहरों को गांवों में ले जाकर ही ग्रामीण पलायन पर रोक लगाई जा सकती है।” उनके इस कथन के पीछे यह कटु सत्य छिपा है कि गांवों में शहरों की तुलना में 5 प्रतिशत आधारभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। रोजगार और शिक्षा जैसी आवश्यकताओं की कमी के अलावा गांवों में बिजली, स्वच्छता, आवास, चिकित्सा, सड़क, संचार जैसी अनेक सुविधाएं या तो होती ही नहीं और यदि होती हैं तो बहुत कम। स्कूलों, कॉलेजों तथा प्राथमिक चिकित्सालयों के हालात् बहुत खस्ता होते हैं। गांवों में बिजली पहुंचाने के अनेक प्रयासों के बावजूद नियमित रूप से बिजली उपलब्ध नहीं रहती। इस प्रकार से गांवों से पलायन के कारण और निवारण निम्न हों सकते हैं।

 आज देश को विकसित देशों की श्रेणी में लाने के लिए गांवों में बुनियादी विकास की आवश्यकता है। गांवों में शहरों जैसी सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। देश में व्याप्त विभिन्न कुरुतियों को समूल नष्ट करना होगा तथा हर जगह शिक्षा की अलख जगानी होगी। शिक्षा के माध्यम से ही ग्रामीण जनता में जनचेतना का उदय होगा तथा वे विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे। आजादी के बाद पंचायती राज व्यवस्था में सामुदायिक विकास तथा योजनाबद्ध विकास की अन्य अनेक योजनाओं के माध्यम से गांवों की हालत बेहतर बनाने और गांव वालों के लिए रोजगार के अवसर सृजन पर ध्यान केन्द्रित किया जाता रहा है। बलवंत राय की अध्यक्षता में गठित समिति ने 73वें संविधान संशोधन के जरिए पंचायती राज संस्थाओं को अधिक मजबूत तथा अधिकार-सम्पन्न बनाने हेतु सौंपी गई रिपोर्ट के अनुपालन में ग्रामीण विकास में पंचायतों की भूमिका काफी बढ़ गई है। पंचायतों में महिलाओं व उपेक्षित वर्गों के लिए आरक्षण से गांवों के विकास की प्रक्रिया में सभी वर्गों की हिस्सेदारी होने लगी है। इस प्रकार से गांवों में शहरों जैसी बुनियादी जरूरतें उपलब्ध करवाकर पलायन की प्रवृत्ति को सुलभ साधनों से रोका जा सकता है।

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4 thoughts on “‘लंका मा सोन के भूती’

  1. सुंदर शब्दों में अगर पलायन को परिभाषित करें तो उसका अर्थ होता है*संभावनाओं की तलाश*जहाँ हम अपने घर और परिवार से दूर रहकर सुख और समृद्धि की राह को खोज सकतें हैं, ओर अपने परिश्रम से अपनी और अपने परिवार की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं।

  2. Nice work… keep it up… there are several subjects through which you can invite the attention of all concerned bodies who can contribute for the wellness of society and needy people

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