ये जो तुम फर्राटेदार वाहन दौड़ाते हो न साहेब!!

वह हमारी जल-जंगल-जमीन की बदौलत है।

ये जो तुम फर्राटेदार वाहन दौड़ते हो न साहब!!

वह हमारी पगडंडियों का इतिहास है।

जब सड़क पर चल रहे मासूम पशूओं को कुचलकर निर्दयीबन आगे बढ़ जाते हो न साहेब!! 

आप पशु-पक्षी जीव-जन्तु को नहीं बल्कि हमारी वन्य जीव के प्रति प्रेम, हमारी प्रकृति को कुचलते हो साहेब।

ये जो तुम्हारी वैश्वीकरण का खेल है न साहेब!!

वह हमारी जल-जंगल-जमीन को हमसे छीनने का पर्याय है।

ये जो आपकी सड़के शहरो से गावों की ओर आयी है न साहेब!!

हमारी कई गावँ अब शहरो के बीच खो सा गया है।

ये जो आपकी विकास की परिभाषा है न साहेब!!

उससे हमारी सम्पदा,संस्कृति,हमारी धरोहर का विनास हो रहा है!!

ये जो पुरे शहर को कांक्रीटीकरण कर के विकास करने का ढोल पिटते हो न साहेब!!

उससे हमारी प्रकृतिक भूमि कही खो सा गया है साहेब।

साहेब क्या बिना विनास के विकास सम्भव नहीं??

साहेब क्या हमारी जल-जंगल-जमीन का संरक्षण और विकास दोनों साथ में सम्भव नहीं है????

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