विमुद्रीकरण बनाम भारतीय किसान- बलवंत छत्तीसगढि़या

विमुद्रीकरण बनाम भारतीय किसान

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मैं 27 वर्ष का एक सामाजिक कार्यकर्ता हूँ । हमारी एक संस्था है एम बी खन्ना फाउंडेशन नाम से जो कि कृषि एवम् शिक्षा के लिए कार्य करती है। हमने इस वर्ष पहली बार प्रायोगिक तौर पर जैविक खेती मात्र 6 एकड़ में किए जिसकी फसल मिजाई हुए आज 15 दिन से उपर हो गया है। चूँकि बारीक़ धान लगाया गया था इसलिये सहकारी मर्यादित बैंक में धान की बिक्री नहीं कर सकते हैं, वहां उचित मूल्य नहीं मिल पाएगी और सारा फसल भाठापारा के मुख्य मंडी में बिक्री करना पड़ सकता है। अब नोटबंदी के कारण वहां अभी तक धान खरीदी शुरू ही नहीं हो पाया है। अब पूरे फसल में जो लागत आई है उसके लागत मात्र को सही समय पर हासिल कर पाना भी किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। उधारी चुकाने का समय आ गया है और बाकि खर्चे भी अब आप मुझे इतना बताइए कि इसमें हमारा क्या दोष है?  साल भर मेहनत करने के बाद भी सही फल नहीं मिल पा रहा है। ऐसी स्थिति में मानो सामने भोजन की थाली तो रखी है लेकिन उसके ऊपर झिल्ली चढ़ा दिया गया हो और जिसे केवल देख सकते हैं खा नहीं सकते, ऐसा ही हाल सभी गांवों में हर किसान का है।

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादूर शास्त्री ने सही कहा था कि जय जवान, जय किसान…. मगर जवान सीमा में बेहाल है और किसान खेत में… अब आप ही बताइए  कि आखिर किसकी “जय” हो रही है…

विमुद्रीकरण करने का उद्देश् बिलकुल सही हैं लेकिन एक सामाजिक कार्यकर्ता की नजर से कहूँ तो इसका वास्तविक धरातल पर योजना लागू  करने की प्रक्रिया सही नहीं जान पड़ती है।

दूरगामी परिणाम जो भी हो लेकिन तात्कालिक स्थिति बेहद दुखदायी है।

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