जमीर/अमीर 

सोचता हूँ मैं भी अमीर बन जाऊं

 बेच अपनी जमीर मैं भी अमीर बन जाऊं

 बहुत चल लिये ईमानदारी के राह 

आखिर क्या मिला फ़क़ीर के फ़क़ीर ही रहे

सोचता हूँ मैं भी अमीर बन जाऊं

बेच अपनी जमीर मैं भी अमीर बन जाऊं 

मा जी, बाबू जी क्या खूब संस्कार दिए आपने हमे 

अभी तक जमीर बचाकर फ़क़ीर रहे 

सोचता हूँ मैं भी अमीर बन जाऊं 

बेच अपनी जमीर मैं भी अमीर बन जाऊं 

खूब सिद्धान्त बनाये जीवन के तूने बलवंत 

क्या हुआ जो फ़क़ीर रहे 

सोचता हूँ मैं भी अमीर बन जाऊं 

बेच अपनी जमीर मैं भी अमीर बन जाऊं 

कुछ लोग जाने क्या-क्या बेच रहे हैं 

आज सफेद कुर्ते के अंदर काली कमाई छिपा रहे हैं 

कुछ लोग सोचता हूँ मैं भी अमीर बन जाऊं 

बेच अपनी जमीर मैं भी अमीर बन जाऊं 

उसूलों और जिंदादिली पे मर-मिटा बलवंत 

वरना आज हम भी अमीर होते 

सोचता हूँ मैं भी अमीर बन जाऊं 

बेच अपनी जमीर मैं भी अमीर बन जाऊं 

औरो का भला किया, बिना लाभ के 

पर क्या मिला सिवा तिरस्कार के 

 सोचता हूँ मैं भी अमीर बन जाऊं 

बेच अपनी जमीर मैं भी अमीर बन जाऊं, 

सोचता हूँ मैं भी अमीर बन जाऊं, 

मैं भी अमीर बन जाऊं 

 ©एम बी बलवंत

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