सामाजिक व्यवस्था की मजबूत कड़ी-विवाह

 सामाजिक व्यवस्था की मजबूत कड़ी-विवाह




विवाह अपने आप में वृहद् विषय है, इस पर लिख पाना उतना ही कठिन है जितना समुद्र में मोती ढूंढना। विवाह पर जितना लिखा जाय उतना कम है। मैं अपना व्यक्तिगत अनुभव एवं विचार  इस लेख के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूं। इसी तरह के अनुभव समाज के अधिकांश लोगों के हो सकते हैं और उनमें से शायद आप अपने जीवन अनुभव से इस आलेख को जोड़ कर देख सकें तो मुझे एहसास होगा कि मैंने समाज के एक बहुत बड़े हिस्से के मन को स्पर्श करने में सफलता पाई है।                                    
                 आईए बात शुरू करते हैं। यह उस वक्त की बात है जब वर्ष 2008-09 में रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में हम कृषि अभियांत्रिकी की पढ़ाई कर रहे थे और वहीं छात्रावास में अन्य साथियों के साथ रहना होता था। तब हमारा बालक छात्रावास दुग्ध प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के अधीन क्षीरसागर बालक छात्रावास हुआ करता था। वहां अक्सर गर्मियों के मौसम में पानी की बहुत गंभीर समस्या हुआ करती थी जिसकी सबसे बड़ी वजह वहीं पास में बने सिटी मॉल के 1000 फीट गहरे बोर जबकि हमारे छात्रावास  के बोर 600 फीट की गहराई के ही थे। इस कारण छात्रावास परिसर के बोर का जलस्तर गर्मियों में नीचे चला जाता था और पेयजल का संकट एक गंभीर विषय बन जाता था। जल संकट के कारण गर्मियों के दिनों में मेस बंद कर दिए जाते थे जिससे बच्चों को बाहर के होटलों से या अन्य माध्यमों से स्वयं के लिए भोजन प्रबंध करना होता था। कुछ लोग कही और से खाना खाते तो कुछ हॉस्टल में ही खाना बनाया करते थे।  वहीं हम कुछ साथियों के साथ आस पास होने वाले शादी समारोहों में बिन बुलाए मेहमान बनकर शिरकत करने पहुंच जाते थे और ऐसे कुछ बच्चों का प्रमुख नेतृत्वकर्ता मैं हुआ करता था।            
    प्रायः गर्मियों के दिनों में हर दिन किसी न किसी वैवाहिक भवन में विवाह हो रहा होता था, चूंकि हमारे छात्रावास के आसपास ही लगभग 15 से अधिक होटल थे जहां बड़े पैमाने पर भव्य वैवाहिक कार्यक्रम प्रायः होते रहते थे। उस समय उन विवाह कार्यक्रमों को देखकर व वहां के समस्त वैभव और भव्यता को ध्यान में रखते हुए मन के किसी कोने में एक विचार जन्म लेने लगता था कि जब अपना विवाह होगा तब हम ऐसा करेंगे, इस तरह की व्यवस्थाएं होंगी, ऐसे तामझाम होंगे और कुछ बातेें जो हमारे नजरिए से ठीक नहीं लगती थीं उन सबके लिए यह भी विचार आता था कि ऐसा नहीं करेंगे आदि आदि। उस समय मेरा मनपसंद भवन था सौभाग्य तिलक एंब्रोसिया, सुनीता पार्क और निरंजनलाल भवन। इनमें सबसे बड़ा भवन था निरंजनलाल भवन, उस वक्त सोचता था कि जब खुद की शादी होगी तो इसी भवन में और इससे भी कहीं ज्यादा भव्यता के साथ सारे आयोजन होंगे।
ऐसे ही मनसूबे ढग़ते हुए समय बीत रहा था और इसी दौरान कृषि अभियांत्रिकी की पढ़ाई के दौरान तत्कालीन प्रदेश सरकार की अतिमहत्वाकांक्षी योजना विमान चालक प्रशिक्षण के लिए मेरा चयन हो गया। मैंने कृषि अभियांत्रिकी के अपने महाविद्यालयीन अध्ययन को अधूरा छोड़कर रोमांचित होते हुए विमान चालक बनने के लिए प्रशिक्षण हेतु साई फ्लैटक एविएशन चकरभाठा हवाई अड्डा बिलासपुर चला गया। 
        विमान चालक अर्थात् हवाई जहाज का कैप्टन या पायलट कहने से ज्यादा वजनदार व पेशे से बहुत ही ज्यादा सम्मानजनक लगता है।  यह एक बेहद सम्मानजनक कार्यक्षेत्र था और इस सम्मान जनक कार्य से जुड़ जाने के बाद मुझे अनेक बड़े घरानों से विवाह के प्रस्ताव आने लगे थे तब मेरी उम्र महज 20- 21 वर्ष ही थी। उस समय मैं सोचता था कि मैं अपने विवाह का समारोह रायपुर स्थित उसी भवन अर्थात् निरंजनलाल भवन में करूंगा, जहाँ कॉलेज के समय में लंगर खाने जाया करता था। शादी के कार्ड को राजाओं महाराजाओं के अंदाज में जैसे कि विशेष दूत द्वारा किसी दूसरे राजा के लिए खास किस्म के बने रेशमी खत की तर्ज पर जिसके दोनों छोर पर कलात्मक डंडे लगे होते थे वैसी ही शैली में बनवाऊंगा तथा बारात के लिए प्राचीन परंपरानुसार बैल गाड़ी का उपयोग करते हुए पूरे देशी ठाठ के साथ छत्तीसगढ़िया संस्कृति व परम्परानुसार विवाह करने का सपना था क्योंकि ऐसी परंपराओं में मेरा ज्यादा रुझान था। एक पायलट के तौर पर मैंने जीवन के सपने देखने शुरू कर दिए थे और न जाने कितने मंसूबे मनोमस्तिष्क पर अपनी जड़ें मजबूती से पकड़ बनाने लगी थीं। ऐसा प्रतीत होता था मानों जिन्दगी ख्वाबों के अधीन हो चली थी।
 हम सबका दुर्भाग्य ही कहिये कि अनेकानेक कारणों से सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना के विफल हो जाने के कारण हमरा वायुयान चालक प्रशिक्षण 9 माह बाद ही बंद हो गया उस समय तक मैंने 54 घंटे 40 मिनट तक की उड़ान अवधि पूर्ण कर चुका था। जब प्रशिक्षण बंद हुआ तो कुछ वर्षो तक लगातार प्रशिक्षण को पुनः प्रारम्भ करने के लिए हम सब मिलकर सरकार के दरवाजे खटखटाते रहे लेकिन आज पर्यन्त वह योजना दुबारा प्रारम्भ नहीं हो सकी और ऐसा प्रतीत होता है कि सदा के लिए योजना को दफन कर दिया गया। योजना को पुनः चालू करवाने के लिए हमारे प्रयासों के दौरान संबंधितों से आश्वासन तो बहुत मिले लेकिन कामयाबी नहीं। 

वायुवायान चालक प्रशिक्षण पूर्णतः बन्द हो जाने के बाद लगने लगा था कि अपना भविष्य बर्बाद हो चका है। अब खुद को सम्हालते हुए परिवार और स्वयं के लिए अब कुछ तो नया करना होगा। शादी की योजना तब धरी की धरी रह गयी जो रिश्ते जबरदस्ती आये पड़े थे सब ने मुह मोड़ लिया। 
धीरे से खुद को खड़ा करते हुए आगे कला संकाय से स्नातक की पढ़ाई पूरी कर फिर समाज कार्य से नियमित स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर सिल्वर मेडल से उत्तीर्ण किया। इस समय तक उम्र 28 पार और आर्थिक स्थिति भी पहले की अपेक्षा थोड़ा बेहतर होने लगी थी, लेकिन 20 से 28 वर्ष के समय चक्र में जीवन ने बहुत कुछ सिखा दिया था, रुपयों की अहमियत और मूल्यों का सम्बन्ध, सब कुछ दिखा गया था।
पढ़ाई के साथ ही 2014 से गैर शासकीय संस्था की शुरुवात की और सामाजिक कार्यो में लग गया। इसी बीच साल 2017 मई में अपने छोटे भाई की विवाह पहले सम्पन्न कराया। खुद के विवाह की कोई योजना अब नहीं रही क्योंकि कोई स्थायी रोजगार नहीं था और न ही कोई स्थाई आमदनी का कोई जरिया। लेकिन विधी का विधान देखिये जुलाई 2017 से ही खुद के विवाह की इच्छा होने लगी लेकिन इस बार योजना कुछ और ही रही तब मैंने व्यक्तिगत रूप से अपने फेसबुक के जरिए एक संदेश जारी किया कि शादी के लिए कोई ऐसी लड़की जो अधिकतम 40 प्रतिशत शारीरिक रूप से दिव्यांग हो उनसे मैं विधिवत पूर्ण होसोहवास से विवाह रचाना चाहता हूँ। मेरे इस फैसले से कईयों ने मुझे शाबासी दिया तो कईयों ने मुझे पागल भी कहा। लेकिन इसके बावजूद भी मुझे ऐसी लड़की नहीं मिल सकी शायद जिन्दगी में जीवनसाथी के तौर पर विधाता ने किसी और को ही मेरे लिए चुन रखा था।  अगस्त 2017 में सामाजिक वैवाहिक ग्रुप के माध्यम से मेरी होने वाली जीवन साथी से मुलाकात हुई, दिव्यांग भले नहीं लेकिन उम्र में मुझसे 5 वर्ष बड़ी जरूर मिली। हमने एक दूसरे की जानकारी साझा की, अपने परिवार वालों से मिले और मिलवाए बात बनते गयी सब राजी हुए दिसम्बर 2017 में सगाई और फरवरी 2018 में विवाह भी सम्पन्न हो गया। इस विवाह की खास बात यह रही कि बिना किसी ताम झाम के, बिना किसी दहेज, बिना किसी गहने, बिना किसी लाव लश्कर के सीमित बारातियों के साथ एकदम सादा रीति रिवाज से सम्पन्न हुई। विवाह में भी मैंने निमंत्रण कार्ड पर स्पष्ट लिखवाया कि विवाह कार्यक्रम में किसी भी प्रकार के मांस मच्छी धूम्रपान मदिरा सेवन पूर्ण रूप से वर्जित एवं वर वधु को आर्थिक या भौतिक उपहार के जगह केवल आशीर्वाद प्रदान कीजियेगा।

आज हमारे विवाह को 4 वर्ष से अधिक होने को है, ढाई साल का हमारा प्यारा से एक बेटा भी है। जीवन में किए गए अनेक संघर्षों और भागदौड़ के बाद आज हमारे पास रोजगार है, वैवाहिक जीवन में हम दोनों ही एक दूसरे का पूरा ख्याल रखते हैं, यूँ कह सकते हैं कि घर को पत्नी ने ही सम्हाला है। इन वर्षो में हमारी कभी लड़ाई नहीं हुई आर्थिक स्थिति आज भीं मध्यम वर्ग से नीचे ही है लेकिन समन्वय एवं सम्मान भरपूर है। इन सब से मुझे यह अनुभव हुआ कि हमारी आर्थिक स्थिति ही हमे  मजबूर करती हैं कि विवाह की योजनाएं और रिश्ते भी हमें हमारी शैक्षणिक, सामाजिक, आर्थिक स्थिति देखकर ही मिलते हैं। विवाह हर इंसान के जीवन का ऐसा महत्वपूर्ण संस्कार व समय है जब वह महसूस करता है कि वैवाहिक कार्यक्रमों को सम्पन्न करने के लिए भले ही बड़ी से बड़ी योजनाएं बना ली जाएं, बेलगाम खर्च कर लिया जाए, लेकिन स्वयं को भी उसके नाते रिश्तेदारों को भी और समाज को भी अधूरा ही लगेगा क्योंकि अपेक्षाओं की कोई सीमा नहीं है और हर आयोेजन सभी की अपेक्षाओं पर शत प्रतिशत खरा साबित हो यह आवश्यक नहीं है। आज समाज में लोगों ने इस तरह के आयोजनों को स्टेटस सिमबल बना लिया है और दिखावे की संस्कृति के पोषक लोग इसके प्रबल समर्थक हो गए हैं। धनाढ्य वर्ग द्वारा अपनाई गई आयोजन शैलियों का अंधानुकरण आज मध्यम व निम्न मध्यमवर्ग भी करने लगा है जिसका परिणाम अब यह होने लगा है कि कुछ पल के दिखावटीपन के चक्कर में वह भारी भरकम कर्ज के बोझ तले एक लम्बे अरसे तक दबा हुआ रहता है। जबकि इसी समाज में कुछ विरले परिवार ही हैं जो कुछ तो अपनी मर्जी से कुछ मजबूरी में एक सादा सामान्य समारोह आयोजित कर विवाह सम्पन्न करवाते हैं। शायद ही कोई यकीन करे, लेकिन सच्चाई यही है कि मैंने अपनेे वैवाहिक रस्मों को पूरा करने में एक लाख रूपये से भी कम खर्च किया था। 
वर्तमान समय में जहाँ मेरा रोजगार हैं, वहाँ मुझे बड़े बड़े वैवाहिक कार्यक्रमों में शामिल होने का अवसर मिलता है,  जहाँ एक लाख रूपये तो चिल्हर से भी कम हैं। वर्ष 2022 में हुए प्रदेश में वैवाहिक कार्यक्रम रायपुर के 5 सितारा होटलों में से सबसे बड़ा हॉटल नवा रायपुर में है। सुनने मे आता है कि वहां एक व्यक्ति अगर उस कैम्प्स में भी प्रवेश करता है तो उससे 6500 रूपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से शुल्क लिया जाता है। अब ऐसी जगह पर अगर मेहमानों के रूप में लाखों की भीड़ आए तो खर्चो का अंदाजा लगाना एक सामान्य व्यक्ति के लिए संभव नहीं होगा, आप स्वयं अंदाजा लगा सकते हैं। इसके बावजूद भी मेहमानों से अगर आप पूछेंगे तो पता चलेगा कि काफी कुछ छूट गया या फिर विवाह समारोह में काफी कुछ कमी रह गई थी। 
    सीधी सी बात है कि आप विवाह कैसे करते हैं यह मायने नहीं रखता,  वह तो केवल अपने विवाह को एक यादगार पल बनाने के लिए किए गए इंतजाम हैं। लेकिन किसी भी वैवाहिक समारोह में दिखावे के लिए आवश्यकता से अधिक खर्च करने से कोई भी व्यक्ति अपने वैवाहिक जीवन में मिठास नहीं ला सकता। वैवाहिक जीवन तो तभी सफल हो सकता है जब दम्पति अपने जीवन साथी का पूरा सम्मान करते हुए, उसके साथ समय बिताएं और एक दूसरे की भावनाओं को समझते हुए संशाधन उपलब्ध करावें। वैवाहिक जीवन में सामंजस्य स्थापित होना बहुत आवश्यक है जिसके लिए सादा जीवन उच्च विचार के मूल मंत्र को हमें आत्मसात करने की जरूरत है। इस मूल मंत्र के माध्यम से ही जरूरत है कि हम अपने विचारों से उच्च होने के साथ ही जीवनशैली में सादिगी को अपनाते हुए एक खुशहाल वैवाहिक व पारिवारिक जीवन की मिसाल कायम करते हुए समाज को नई दिशा दे सकते हैं।

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5 thoughts on “सामाजिक व्यवस्था की मजबूत कड़ी-विवाह

  1. भैया आपके जीवन मे इतना उतार चढ़ाव मुझे पता ही नही था। आपका ब्लॉग पढ़ने में रुचिकर था ।🙏

  2. नमस्ते, सुबह सुबह ही आपका ब्लॉग पढ़ा।कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह हमेशा की तरह सार गर्भित और सामयिक है।

  3. महोदय आपका यह लेख काफी सारगर्भित और सत्यता को प्रमाणिक करता है, आपसे अनुरोध है की ऐसे ही ज्वलंत मुद्दों पर परिचर्चा आधारित लेख लिखते रहे।

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