मेरे जीवन की रचनाकार रचना

मेरे जीवन की रचनाकार रचना

रचना की उस रात थाना में रात्रिकालीन ड्यूटी थी। रात्रि में भोर होने से पहले के समय में वायरलेस पर पॉइंट आता है कि शहर के बाहरी इलाके में कचरे के ढेर में एक बच्चे के रोने की आवाज आ रही है, तत्काल एक टीम रवाना कीजिए। प्रायः ऐसा होता है कि रात्रिकालीन गस्त में अतिरिक्त निरीक्षक के साथ हवलदार एवं आरक्षक भी रहते हैं, लेकिन उस रात रचना को जब पता चला कि एक बच्ची के रोने की आवाज आ रही है तब वह खुद को वहाँ जाने से नहीं रोक पाई। रचना जब पॉइंट पर पहुंची तब उसने देखा कि 1-2 महीने की बच्ची कचरे के ढेर पर पड़ी रो रही है। रचना उस बच्ची को अपनी गोंद में उठा लेती है और पहले अस्पताल जाती है वहाँ उसकी कुशलक्षेम की जाँच करवाती है तब पता चलता है कि बच्ची को दिल की समस्या है। तब रचना को लगता है कि शायद इसी कारण से उसके मां-बाप ने उस नन्ही सी जान को ऐसे ही कूड़ेदान में फेंक दिया। एक पल के लिये उस माँ बाप पर रचना को खूब गुस्सा आया, कैसे दिल होंगे उनके जो अपनी ही बच्ची को ऐसे कचरे के ढेर में फेंक गये। ऐसी क्या मज़बूरी रही होगी उनकी फिर तुरंत रचना को ख्याल आया कि शायद यही विधि का विधान हो।
चूँकि हमारी शादी को 5 वर्ष से ज्यादा हो चुके हैं और चाहकर भी अभी तक हमारी औलाद नहीं हो पायी है। मेरी पत्नी अर्थात रचना शहर में डी.एस.पी. है और मैं सर्जन हूँ मैं दिल का विशेषज्ञ हूँ, दोनों अच्छे क्षेत्र में कार्यरत हैं लेकिन हमें औलाद सुख अभी तक नहीं मिल पाया है। चूँकि काफी खोज बीन के बाद भी उस बच्ची के माता पिता की कोई शिनाख्त नहीं हो सकी तब रचना ने मुझसे चर्चा कर उसी बच्ची को गोद लेनी की इच्छा जाहिर की जिसे मैंने भी सहर्ष सहमति दे दी। फिर हमने विधिवत उस बच्चे को गोद ले लिए वैधनिक औपचारिकताओं को पूरा किया। ईश्वर की इच्छा या संयोग ही कहें कि ड्यूटी के समय रचना को वह बच्ची मिली। इससे पहले रचना की पोस्टिंग छत्तीसगढ़ के सुदूर क्षेत्र में रही। साल भर पहले ही उनको शहर में पोस्टिंग मिली है। बचपन से ही बुराइयों के खिलाफ और महिला सशक्तिकरण को लेकर काफी सजग रही। पढ़ने में भी एक्टिव रहीं और यही वजह है कि एक महिला के रूप में भी ला एण्ड आर्डर में एक चुनौती पूर्ण पोस्ट को संभाल रही है, साथ ही साल भर हो गया बच्चे को भी संभाल रही है।
हम दोनों पति पत्नी ने मिलकर उस बच्ची का नाम पारिजात रखा है। पारिजात अर्थात एक बहुत ही खूबसूरत और सुगंधित पुष्प् जिसे देव वृक्ष की संज्ञा भी दी जाती है, वह जिस बगिया में होता है उस बगिया को अपनी खुशबू से महका देता है। यही सोचकर हम दोनों ने बच्ची का नाम पारिजात रखा है। हम दोनों ही अपने अपने कार्य क्षेत्र में कार्य करते हुए अपनी बच्ची का भी बराबर ध्यान रख रहे हैं, लेकिन कहानी जितनी सामान्य और अच्छी लग रही है, वैसा है नहीं। हर वह महिला अधिकारी अपने कार्मिक क्षेत्र और अपने पारिवारिक दायित्वों में सामंजस्य बनाए रखने का भरपूर प्रयास करती है, बावजूद इसके वह कहीं न कहीं इस बात के लिए अवहेलना भी झेलती है कि वह एक महिला है। अगर महिला अधिकारी अगर डीएसपी के पोस्ट में हो तो उसके जो कनिष्ठ कर्मचारी हैं उनको नागवार हो सकता है और वे सहज ढंग से उसे अपने अधिकारी के तौर पर स्वाीकार नहीं कर पाते हैं। संभवतः पुरूष प्रधान समाज की यह विडंबना ही है। उनका काम करने का तरीका घर में अगर काम अच्छे से ना हो, घर परिवार के प्रति पूरा ध्यान यदि अच्छे से ना हो तो सास-ससुर और यहां तक कि कई बार पति भी उनकी अवहेलना करता है।
संभवतः इस प्रकार की स्थितियां हर महिला अधिकारी के जीवन में घटित होती होंगी और इस प्रकार की अवहेलना हर महिला को झेलनी पड़ती होंगी। जीवन में कभी ना कभी महिला अधिकारी होना उनके लिए पाप सा लगने लगता है। सामान्य सा मनोविज्ञान है कि हम पुरुष प्रधान वर्ग ऐसा करना अपना अधिकार समझ बैठते हैं और मानकर चलते हैं कि सदैव पुरुष का ही वर्चस्व बना रहे। दोस्तों ऐसा नहीं है कि महिला तो आदि शक्ति है, मां दुर्गा का रूप है जो हमारे जीवन की सबसे बड़ी रचनाकार होती है और रचना मेरे जीवन की रचनाकार ही है जिसने मेरे जीवन में जब से आई है तब से खूबसूरती के रंग भरे हैं। लेकिन वह प्रतिदिन समाज के एक ऐसे वर्ग से दो चार होती है जिसे यह स्वीकार्य ही नहीं है कि उनका अधिकारी एक महिला है। कइयों को तो यह भी स्वीकार्य नहीं है कि उनको एक महिला को सलामी देनी होती है। आज हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहे हैं फिर भी यह बात विचारणीय है कि क्या हमारे समाज में समानता आ पायी है, सामाजिक समानता, मानसिक समानता, महिला पुरुष समान अधिकार एवं सम्मान शैक्षिणक समानता क्या हम और आप मिलकर इस खाई को दूर नहीं कर सकते। अपने कार्यस्थल या कर्तव्य पथ पर या कहे अपने घरेलू माहौल पर हम पुरुष वर्ग अपनी महिला साथी फिर चाहे वह हमारी वरिष्ठ अधिकारी हो, बेटी हो, बहु हो, पत्नी हो, सभी को उनके स्वाभिमान एवं सम्मान से जीने का सम्मान दे सकें।
यह कहानी आपके ही आस पास की लगे या फिर आपके घर परिवार में इसका मिलान हो तो यह एक संयोग मात्र ही कहा जाएगा। अगर आपके आस पास भी कोई रचना हो, कोई पारिजात हो, तो उनका सम्मान कीजिये, उनको उनका अधिकार दीजिये, चाहे वह जिस भी जिम्मेदारी का निर्वहन कर रही हो, उसमें उसका साथ दीजिये फिर देखिये यह समाज और संसार कितना खूबसूरत लगने लगेगा। शांत चित्त से इन बातों पर एक बार विचार अवश्य कीजिएगा। कन्याओं का पूजन केवल नवरात्रि के समय करने और कन्या भोजन करवा देने मात्र से ही उन्हें शक्तिस्वरूपा मान लेना उचित नहीं होगा। ज्यादा अच्छा हो कि जीवन के हर क्षेत्र में हम उन्हें समानता की दृष्टि से देखें और पुरूष प्रधान समाज की मानसिकता से अलग हटकर महिला-पुरूष समान हैं, ऐसी मानसिकता का पोषण करेें, निश्चित ही समाज की बहुत सी विसंगतियां दूर हो जाएंगी और यह दुनिया और समाज ज्यादा खूबसूरत लगने लगेगा। जहां तक मेरी सोच है, मेरा मानना है कि स्त्री-पुरूष दोनों ही समानता का अधिकार रखते हैं, दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं, इस भ्रम को दिमाग से निकाल देना चाहिए कि पुरूष ही श्रेष्ठ है और परिवार में महिला दूसरा स्थान रखती है।
उपर्युक्त विचारों से आप किस हद तक सहमत हैं, अपनी टिप्पणी के माध्यम से अवश्य ही अवगत कराने का कष्ट करें।
इस लेख में वर्णन किये गए सभी पात्र- पत्राए काल्पनिक है लेखक द्वारा किसी भी व्यक्ति, जाति, धर्म और समुदाय के भावनाओं को आहत पहुँचाने का उद्देश्य नहीं है 

बलवंत सिंह खन्ना
विचारक हिंदी साहित्य 
स्वतंत्र लेखक, कहानीकार

 

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3 thoughts on “मेरे जीवन की रचनाकार रचना

  1. भारत देश के संस्कृति एवं विरासत आपके कहानी संरक्षित करना का कार्य कर रहा है। भारतीय समाज में इस प्रकार की लेखन की बहुत ही ज्यादा आवश्यक है। शुभकामनाएं के साथ:—-पोषराम साहू

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