90 दशक का जामुन



 90 दशक का जामुन

यूँ तो जामुन को ग्रामीण/शहर सभी जगह जाना जाता है। लेकिन अगर इससे जुड़े किस्सों की बात करें तो वह केवल ग्रामीण अंचल के लोग और खासकर 90 के दसक के पहले वाले ही बता पाएंगे। जी हाँ जैसे ही आसाढ़ लगती और वर्षा प्रारम्भ होती वैसे ही खेतो में लगे जामुन के पेड़ में फल पकने लगते थे। तब के समय में गर्मियों की छुट्टी के बाद विद्यालय 1 जुलाई से खुला करती थी। उससे पहले बच्चे खूब उदम मस्ती करते थे। ग्रामीण परिवेस में रहने वाले हम जैसे बच्चे अनेक प्रकार के खेल-कूद के साथ ही जंगलो में,खेतो में मौसमी फल का आनन्द लेते थे। उसी में से एक फल हुआ करता था जामुन का मुझे अच्छे से याद है तब हम सुबह घर से थैले में खड़ी नमक(गांव में पहले आयोडीन युक्त खड़ी नमक का उपयोग करते थे) और मिर्च को पीसकर बुकनी(नमक+मिर्च का सुखा मिश्रण को छत्तीसगढ़ी भाखा में बुकनी कहा जाता है) बना लिया करते थे और फिर दोस्तों के झुण्ड में निकल जाते थे दूर जंगलो की तरफ मस्त मौला होकर न कोई फ़िक्र न कोई चिंता। तब के समय में हमारे घर वालो को भी कोई चिंता फ़िक्र नहीं होती थी जितनी आज हम अपने बच्चों को अकेले छोड़ने पर करते हैं। पुरे दिन खेतो में जंगलो में घूम-घूम कर बड़े बड़े जामुन के पेड़ो पर बिना किसी डर के चढ़ जाया करते थे और पेड़ के उपर में ही डाल पर बैठकर बुकनी के साथ जामुन खाया करते थे। दिनभर घूम घूमकर खाने के बाद आखिर में घर लाने के लिए भी चुन चुनकर तोड़ा करते थे। वास्तविक में तब के बच्चों में  व्ययाम का उचित माध्यम खेल कूद और प्राकृतिक दिनचर्या ही हुआ करता था जो आज के शहरीकरण और चका-चौंध में कही खो सा गया है। आज अपने बचपन को याद कर के उन दिनों को पुनः जीने का मन करता है लेकिन अब चाहकर भी यह संभव नहीं है। पहले जहां हम पुरे खेत-खलिहान, पारा-मोहल्ला घूम आया करते थे वही आज जब अपना बच्चा गली में भी निकल जाए तो चिंता होने लगती है। जिन्दी मानो सिकुड़ रही हो……

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5 thoughts on “90 दशक का जामुन

  1. बात तो बिलकुल सही कही आपने, वो दौर ही कुछ और था
    अब तो जामुन के पेड़ भी नहीं दिखते…..

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