बाबू जी मेरा बेटा भूखा है!!!

प्रतीकात्मक चित्र

कुमार रोजाना अपने कार्यालय सेवा के पश्चात कुछ देर ओला बाइक राइड करता है और राहगीरों को उनके मंज़िल तक पहुँचाने का काम करता है। कुमार बाइक राइड के दौरान आज रात के 8 बज चुकें थे शहर के व्यस्ततम चौक में बुकिंग के इंतजार में कुमार खड़ा ही था कि एक अधेड़ महिला दौड़ते हुए कुमार के पास आई, महिला बेहद व्यथित लग रही थी उसने कुमार को हड़बड़ाते हुए बोली कि बाबू जी कृपया मुझे जल्दी घर छोड़ दोगे क्या। बाबू जी मैं आपका अहसान जीवन भर याद रखूंगी महिला जिस गति से बोले जा रही थी उसको देखकर कुमार कुछ समझ ही नही पा रहा था। लेकिन एक बात तो तय थी की महिला बहुत ही घबराई और चिंतित जान पड़ती है। कुमार कुछ कह पाता उससे पहले ही महिला गाडी पर बैठ गई कुमार ने महिला से उसके घर का पता पूछा और कुमार ने भी सोचा, चलो जब इतनी लाचार बेबस महिला दिख रही है तो उसकी मदद किया जाए और कुमार ने गाड़ी आगे बढ़ाते हुए उसके घर की दिशा में आगे बढ़ गया। महिला बार-बार हड़बड़ाते हुए व्यथित भाव से कहती रही कि बाबूजी जल्दी चलिए ना मेरा बेटा भूखा है, मेरा बेटा भूखा है सुबह से कुछ नहीं खाया है। कुमार बार-बार उस महिला को तसल्ली देते हुए शांत कराने का प्रयास करता रहा। आखिरकार कुछ समय बाद महिला के घर पहुँच गए। घर पहुंचते ही महिला गाड़ी से कूद गई और बड़ी ही तेज गति से दौड़ते हुए घर के अंदर जाने लगी। जैसे ही अंदर गई वैसे ही मानों ऐसा लगा कि एक प्यारा सा बच्चा हाथ बढाए हुए अपने माँ की तरफ आगे बढ़ रहा हो, कुमार भी यह दृश्य देख रहा था फिर अचानक से मानो वह बच्चा रेत के घर की तरह गायब हो गया इन सब के बीच महिला वहीं पर बेशुद होकर गिर पड़ी।

कुमार दौड़ते हुए उसको उठाया, घर पर एक बुजुर्ग महिला भी थी जो कि उस महिला की सासू मां थी। उसने कुमार के पूछने पर बताया कि हम दोनों अभागन माएँ हैं बेटा। कुछ साल पहले की बात है, मेरा एक बेटा और एक पोता था। हम लोगों का छोटा सा खुशहाल परिवार था, मेरा बेटा रोजी मजदूरी करने जाता था। मैं और मेरी बहू घरों पर बाई का कम करते थे। लेकिन मेरा बेटा बहुत ज्यादा शराबी था। जितना मजदूरी कर के कमाता उतना शराब में उड़ा देता था। मेरा पोता उस समय 5 साल का था। जीवन इसी तरह गुजर रहा था कि एक दिन मेरा पोता बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया। मैं और मेरी बहू काम पर गये हुए थे। पोता घर पर तब अकेले ही था। उसको इलाज की जरूरत थी। मुझे और मेरी बहू को घर आने में देर हो गई, तब मेरा बेटा घर पर ही था लेकिन शराब के नशे में बेसुध पड़ा था, उसे होंश ही नहीं था। बीमार हालत में मेरा पोता खत्म हो गया और जब मेरे बेटे को होश आया तब उसको पता चला कि उसका बेटा उसकी गलती की वजह से खत्म हो गया। इस दुख और सदमे में मेरा बेटा और ज्यादा शराब पीने लगा, कुछ दिन बाद ही वह भी चल बसा।

यह सब घटनाएं हमारे छोटे से परिवार के लिए बहुत भारी पड़ी। दुखों का पहाड़ हमारे ऊपर टूट पड़ा था। मेरी शक्ति तो अब नहीं रही लेकिन आज भी मेरी बहू बर्तन झाडू पोछा का काम कर के मेरा और खुद का पालन पोषण कर रही है। मेरी बहू कभी-कभी अपने बेटे की याद में ऐसी व्यथित हो जाती है और सब भूल जाती है फिर राह में किसी भी सज्जन से मदद माँगने लगती है। शराब के नशे ने हम दोनों माँओं से अपने बेटों को छीन लिया। शराब का नशा हर गरीब परिवार को तोड़ने और खत्म करने का ही काम करती है। शराब का नशा किसी भी रूप में समाज के लिए हितकारी नहीं है। शराब ने हमेशा से ही जीवन लीला छीनने का ही काम किया है। ना जाने हम जैसे कितनी माँओं ने अपने बच्चे खोयें हैं। अपना पसीना बहाकर परिवार का भरण पोषण करने वाले मेहनतकश लोगों को यह बात कब समझ आयेगी कि जो पैसा वह अपने परिवार के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए उपयोग कर सकते हैं उसी पैसे को वे लोग परिवार की बरबादी के साथ ही अपनी मौत खरीद रहे हैं। पूरी दुनिया जानती है कि शराब के नशे में लत रहने वाले किसी एक भी व्यक्ति के परिवार में सिवाय बरबादी के कुछ भी हासिल नहीं हुआ। शराब से तौबा करना ही खुद की बेहतरी और परिवार की खुशहाली की कुंजी है। कुमार उस दादी अम्मा की बात सुन भाऊक हो गया था लेकिन विधि के विधान के आगे नत मस्तक होकर वह आगे किसी राहगीर को उसके मंज़िल तक पहुँचने के लिये बढ़ गया।

लेखक- बलवंत सिंह खन्ना
स्वतंत्र लेखक एवं कहानीकार

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *