प्रकृति के उपासक हम छत्तीसगढ़ियों का लोकपर्व: नांगर तिहार (हरेली)

पहले जब स्कूल में गर्मियों की छुट्टी समाप्त होती थी वैसे ही 1 जुलाई से स्कूल प्रारम्भ हो जाया करता था। स्कूल के साथ ही गांवों में कृषि कार्य भी प्रारम्भ हो जाया करता था। वैसे तो किसानी एवं किसान का कभी अवकास नहीं होता है। वे बारह मास काम करते हैं लेकिन आषाढ़ मास से जब वर्षा रानी बरसने लगती है तब से किसानों के चेहरे पर चमक और ख़ुशी की बहार दिखने लगती है। मुझे याद है बचपन में हम स्कूल से छुट्टी के दिन रविवार को बाबू जी के साथ खेत जाया करते थे और तब ही कृषि कार्यों को बारीक़ से देखने और करने का सौभाग्य मिलता था। जब धान बउग (बोवांई) से कार्य प्रारम्भ होता और महीने भर के अंतराल में धान का पौधा जब 1 फिट की उंचाई जितना लंबा होता तब ब्यासी कार्य करते थे। उस दौरान जब खेतों में नागर (हल) का कार्य पूर्ण हो जाने पर समय आता था सावन मास की प्रथम अमावस्या की।

इस दिन का हमें पूरे सालभर से इन्तजार रहता था। इंतज़ार इसलिए क्योंकि यही वो दिन होता जब घर में विशेष रूप से चांवल-आटे के साथ गुड़ का चीला बनता था जो ग्रामीण परिवेश में रहने वाले हर व्यक्ति का प्रिय व्यंजन हुआ करता था जो आज भी है। हमारे यहाँ मान्यता है कि हम छत्तीसगढ़िया प्रकृति के उपासक हैं हमारी हर तीज त्यौहार में प्रकृति का ही पूजा किया जाता है। हरेली से पहले जेठ के माह में अक्ति के दिन खेतों में धान के बीजों को छिड़कते हैं। ऐसी मान्यता है कि खेतों में अग्रिम अन्न चढ़ाया जाता है, जिससे आगामी कृषि कार्य में बढ़ोत्तरी हो। इसके अलावा पंचमी में नाग सर्प की पूजा, पोरा में नंदी बइला का पूजन, तीज में पत्नी अपने सुहाग के लिए निर्जला उपवास, दीवाली में गौधन एवं धान की पूजा, छेरछेरा में अन्न की पूजा ऐसे अनेक तीज त्यौहार पर हम प्रकृति की पूजा करते हैं। किंतु जैसे-जैसे संस्कृतिकरण का आगमन हुआ वैसे ही तीज-त्यौहार के रूप और प्रकृति में आमूल-चूल परिवर्तन या विकृत रूप देखने को मिल रहा है। इसका एक कारण अनेक संस्कृतियों का मिला-जुला स्वरूप भी हो सकता है। हरेली को गांव में हम छत्तीसगढ़ी में नांगर तिहार के नाम से जानते हैं। इस दिन हरेली पर्व को छोटे से बड़े तक सभी उत्साह और उमंग के साथ अत्यंत भव्यता के साथ मनाते हैं। गांवों में हरेली के दिन नागर, गैती, कुदाली, फावड़ा समेत खेती-किसानी से जुड़े सभी औजारों, खेतों और गोधन की पूजा की जाती है। इस दिन हम सभी बच्चे बहुत उत्साहित रहते थे। घर में खाने की चीजें बहुत होती थी। नारियल का तो ढेर लगा रहता था। घर में कुल देवता से लेकर पशुधन एवं कृषि औजार आदि की पूजा के लिये कई नारियल फोड़े जाते थे। सभी घरों में चीला, गुलगुल भजिया का प्रसाद बनाया जाता था। पूजा-अर्चना के बाद गांव के चौक-चौराहों में लोगों का इकट्ठा होना शुरू हो जाता था। यहां गेड़ी दौड़, नारियल फेंक, मटकी फोड़, रस्साकस्सी जैसी प्रतियोगिताएं देर तक चलती थी। लोग पारंपरिक तरीके से गेड़ी चढ़कर खुशियां मनाते थे जो कि आज भी कहीं-कहीं पर देखने को मिल जाता है। माना जाता था कि बरसात के दिनों में पानी और कीचड़ से बचने के लिए गेड़ी चढ़ने का प्रचलन प्रारम्भ हुआ, जो समय के साथ परम्परा में परिवर्तित हो गया। इस अवसर पर किया जाने वाला गेड़ी लोक नृत्य भी हमारी पुरातन संस्कृति का अहम हिस्सा रही है।

हरेली में लोहारों द्वारा घर के मुख्य दरवाजे पर कील ठोककर और नीम की पत्तियों को लगाने का रिवाज है। मान्यता है कि इससे घर-परिवार में खुशियों का वास होता है और नकारत्मक शक्ति दरवाजे से ही दूर हो जाती है। हरेली के दिन किसान अच्छी फसल की कामना के साथ धरती माता का सभी प्राणियों के भरण-पोषण के लिए आभार व्यक्त करते हैं और अच्छी बारिश से कृषि में उन्नति लाने की दुआ मांगते हैं। इस दिन गांव के चरवाहा ( गौधन को चराने वाले) बरगंडे के पत्तों के साथ नमक मिलाकर गायों एवं अन्य पशुधन को खिलाते हैं। इसके पीछे तर्क होता है कि इसको खिलाने से पशुधन में रोग नहीं लगते हैं और वे स्वस्थ रहकर किसान को कृषि कार्यों में मदद करते हैं।
प्रदेश की वर्तमान कांग्रेस सरकार ने मुख्यमंत्री निवास सहित पूरे राज्य में लोकपर्वों का बड़े ही धूमधाम से सार्वजनिक आयोजन कर इसकी शुरूआत की है। इससे नई पीढ़ी के युवा भी अपनी पुरातन परम्पराओं से जुड़ने लगे हैं। सरकार ने हरेली त्यौहार के दिन सार्वजनिक अवकाश घोषित किया है। इसके अलावा इस वर्ष से प्रदेशभर के स्कूलों में हरेली तिहार को विशेष रूप से मनाने की शुरूआत की जा रही है। इससे बच्चे न सिर्फ अपनी कृषि-संस्कृति को समझेंगे, उसका सक्रिय हिस्सा बनेंगे बल्कि अपनी संस्कृति के मूल भाव को आत्मसात भी करेंगे। साथ ही स्कूलों में गेड़ी दौड़, वृक्षारोपण, पर्यावरण संरक्षण पर संगोष्ठी जैसे आयोजनों से बच्चों में अपनी संस्कृति और प्रकृति के प्रति प्रेम विकसित होगा।

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