किसी से मित्रता रखने के लिए क्या सामने वाले के पास भौतिक सुख साधन का होना आवश्यक है..??

यद्यपि पायलट ट्रेनिंग को बंद हुए 14 माह से अधिक समय हो चुके थे, लेकिन मनो मस्तिष्क से वह एटीट्यूड अभी तक खत्म नहीं हुआ था जबकि हम अर्श से उतर कर फर्श पर आ चुके थे। आप जब एक समय में जिस वजह से किसी क्षेत्र या फिर अपने आसपास के लोगों के बीच एक सेलिब्रिटी होते हों और अचानक वह वजह ही आपके जीवन से दूर हो जाए तब यह स्वीकार करना बेहद कठिन होता है कि अभी तक तो आप हवाओं में आजाद पंछी की तरह उड़ रहे थे लेकिन अब सहसा धरातल पर आ गए हैं। जब आपसे आपके जीवन की उड़ान छीन ली गई हो और इसी सोच विचार में उलझकर जीवन की उथल-पुथल में गोते लगाते हुए जीवन काट रहे थे। एक तरफ तो स्नातकोत्तर की पढ़ाई छोड़ी और जिस उद्देश्य से पढ़ाई छोड़ी, वह उद्देश्य पल्लवित होने से पहले ही मुरझा गया। पायलट ट्रेनिंग भी बंद पड़ी थी, जीवन में कुछ भी सकारात्मक नहीं हो रहा था। ट्रेनिंग को पुनः आरंभ करवाकर पूरा करवाने की फरियाद लेकर बार-बार शासन के दरवाजे खटखटाते रहे और हर बार निराश होकर वापस लौटना पड़ता, साकार होने जा रहे सपने पर जैसे ग्रहण लग गया हो। मन में खिन्नता बढ़ रही थी, ध्यान परिवर्तित करने के लिए मेरा ज्यादा से ज्यादा समय फेसबुक पर व्यतीत होने लगा था। उस समय फेसबुक मुझे एक सच्चा हितैषी मित्र जैसे लगने लगा था। मित्र इसलिए कि प्रत्यक्ष तौर पर मित्रों से मिलना बहुत कम हो पाता था। सभी मित्र अपने अपने कार्यों में व अपनी जिन्दगी के ढर्रे पर व्यस्त थे जबकि मैं कहीं ना कहीं से बेजार और टूटा हुआ सा महसूस कर रहा था। वह क्षण हर किसी के लिए बहुत कठिन हो जाता है और सच तो यह है कि ऐसे सवालों का किसी के पास कोई सटीक जवाब भी नहीं होता खासकर तब, जब लोग जानना चाहते हैं कि क्या हुआ, क्यों बैठे हो, कब प्रारंभ होंगे आपके आगे के कार्य आदि…आदि। तब शायद आपके पास कोई उचित या वैकल्पिक जवाब नहीं होते। तब आप ना चाहते हुए भी खुद को निहायत अकेला महसूस करने लगते हैं, ऐसा प्रतीत होता है जैसे दुःखती रग को किसी ने दबा दिया हो।
सच कहूं तो ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हो रहा था। इस बीच फेसबुक पर एक महिला मित्र बनी जिसको मैंने जितना समझा वह बहुत ही सरल और अच्छी मित्र थी। चूंकि वह विवाहित मित्र थी इसलिए मैं उनको भाभी कहता था। शादी से पहले उन्होंने भी एयर होस्टेस की ट्रेनिंग ले रखी थी लेकिन पारिवारिक असहमति के कारण वे एयर होस्टेस के क्षेत्र में अपनी सेवाएं नहीं दे सकीं। जब उनको पता चला कि मैं भी पायलट प्रशिक्षण ले रहा हूं तो उनकी रूचि या कह सकते हैं कि हम दोनों की मित्रतावश रुचि एक दूसरे से बहुत कुछ मिलती जुलती हो चुकी थी और यही वजह थी कि हमारी आपसी बातचीत बहुत ही सम्मानजनक हुआ करती थी। उनकी एक जुड़वा बहन थी, अगर दोनों को एक साथ खड़ा कर दिया जाए तो किसी के लिए भी पहचान पाना बहुत कठिन। बातचीत में एक दिन भाभी ने बताया कि उनकी एक चचेरी बहन लवी (परिवर्तित नाम) भी है जो भिलाई में अभियांत्रिकी की छात्रा थी। हम दोनों की जब भी बात होती थी तो कहीं ना कहीं भाभी अपनी चचेरी बहन की तारीफ किया करती थी और बार-बार उनके मुंह से उसका जिक्र होने से मैं भी उनकी बहन में विशेष रुचि लेने लगा था। एक दिन फेसबुक में उसका नाम सर्च करके मैंने उसको फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजा। लवी ने बिना फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट किए मैसेज के जरिए बात चीत शुरू कर दिया। हम दोनों के बीच काफी दिनों तक अच्छी खासी बात बातचीत हुई और आखिर में उसने मेरा फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर लिया।
फेसबुक पर भले ही हम दोनों अनजान थे लेकिन जितना उसकी बहन ने मेरे सामने उसकी तारीफ की थी उससे कहीं ज्यादा उसकी बहन ने उनके सामने मेरी तारीफ की थीं। हम दोनों तो पहले से ही एक दूसरे के प्रति आकर्षित थे और यह आकर्षण ही था जिसने एक दूसरे की तरफ आगे बढ़ने में मदद किया। दर असल जब वह कक्षा 12वी की छात्रा थी तब से ही वह किसी अन्य के साथ रिलेशनशिप में रही फिर चार साल बाद अचानक उसका ब्रेकअप हो गया था। उस ब्रेकअप की पीड़ा से वह बहुत दुःखी रहा करती थीं और इसी दुख में वह अभी भी डूबी हुई थी। इधर पायलट ट्रेनिंग बंद हो जाने की वजह से मैं भी बहुत दुःखी था। हम दोनों के ही जीवन में व्याप्त निराशा शायद हम दोनों को आपस में मिलाने की एक बहुत बड़ी कड़ी साबित हुई और देखते ही देखते हम दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला लगातार आगे बढ़ता गया। हम दोनों एक दूसरे की भरपूर तारीफ किया करते थे। भले ही मेरी ट्रेनिंग पूरी नहीं हुई थी लेकिन मैं उसके लिए एक सेलिब्रिटी से कम नहीं था। उसको गर्व होता था कि वह एरोप्लेन के पायलट से बात कर रही है। लेकिन मैं वह एटीट्यूड अंदर से ला नहीं पा रहा था क्योंकि मेरी ट्रेनिंग अधूरी थी। हमारी मुलाकात कब करीबी दोस्ती में बदल गई और दोस्ती कब प्यार में, पता ही नहीं चला। हम एक दूसरे पर बहुत ज्यादा भरोसा भी करते थे। भरोसे की बात की जाए तो इस स्तर तक करते थे कि दोनों ही एक दूसरे के फेसबुक और मेल आईडी और पासवर्ड तक शेयर कर रखे थे। लेकिन मुझे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि उसकी तरफ से जो चाहत थी वह केवल मेरे प्रोफेशन की वजह से जागृत हुई थी। अगर मैं भी एक सामान्य प्रोफेशन में होता या फिर एक कॉलेज स्टूडेंट होता तो उसका झुकाव मेरे प्रति संभवतः नहीं हुआ होता।
तब रायपुर में खुद को सरवाइव करने के लिए मैंने हर्बलाइफ में काम कर रहा था। तब हम लोगों की दिनचर्या ऐसी होती थी कि महीने में दो या तीन बार हम लोग आपस में मिलते थे। मैं अपनी बाइक से भिलाई तक जाता। उसके कॉलेज का टाइमिंग प्रातः 11ः00 बजे से शाम 4ः00 बजे तक होता था। और वह कॉलेज बंक कर भिलाई से रायपुर आती और शाम 4ः00 बजे उसको मैं वापस भिलाई छोड़ता। जब भी हम लोग मिलते थे तब मेरे पास मेरी पहली गर्लफ्रेंड मेरी पल्सर बाइक होती थी जिससे हम अकसर घूमा करते थे। उस समय लवी को लगता था कि उसका बॉयफ्रेंड हायर प्रोफेशन वाला है और 2012-13 के समय में किसी के पास पल्सर होना मतलब यूथ जेनरेशन के लिए हर पल एक अलग फील देता था, और जिनके पास पलसर बाइक होती थी उन लड़कों के पास शायद ऐसा लगता था कि लड़कियां ज्यादा दोस्ती करती हैं। अप्रैल 2013 का समय था, मुझे याद है मैं अपनी बाइक को कुछ समय के लिए गांव में छोडकऱ आया था और तब मेरे पास में हीरो होंडा की डीलक्स एक छोटी बाइक थी। करीब एक महीने मैं उसी गाड़ी से चला। इस बार जब लवी से मिलने भिलाई गया तो लवी ने मुझे बिना बताए ही अपने दोस्तों से मिलवाने का एक सरप्राइज प्लान किया था और शायद उसने अपने दोस्तों के सामने मेरे बारे में कुछ ज्यादा ही या फिर कहें कि जरूरत से ज्यादा ही तारीफ कर दी थी।
जब मैं भिलाई पहुंचा और उसके दोस्तों के सामने गया तो उसका चेहरा एकदम गुस्से से लाल हुआ पड़ा था, लेकिन सबके सामने वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। पता नहीं उसने क्या क्या प्लानिंग कर रखी थी अपने दोस्तों से मिलवाने के लिए। लेकिन जैसे ही मुझे देखी तो सारा प्लान कैंसिल करके अपने दोस्तों को बाय बोली और हम दोनों वहां से निकल गए। जब भिलाई से हम लोग निकले तब रायपुर पहुंचने तक पूरे रास्ते उसने मुझसे कोई बात ही नहीं की। मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि मुझसे क्या गलती हो गई भाई। जब रायपुर पहुंचे तब उसने मुझ पर पूरी भड़ास निकालते हुए कहा कि मैंने अपने दोस्तों से मिलवाने का पूरा प्लान बना रखा था और उसी दिन आपको इस खटारा बाइक में आना जरुरी था क्या?? तब उसकी बातों का मेरे पास कोई उत्तर नहीं था। क्या बोलूं मतलब कुछ समय के लिए तो मैं आवाक् हो गया था, मेरे पास शब्द नहीं थे। मतलब ऐ क्या बात हुई यार?? क्या भौतिकता या दिखावा के लिए दोस्ती हुई थी और बस यूं ही हम एक दूसरे को चाहने लगे थे। मेरे अंदर ऐसा कुछ भी नहीं था कि वह किसी वजह को लेकर या फिर चाहे मेरी चाहत हो, उसके लिए या फिर मैं उससे प्यार करूं या ना करूं मेरे अंदर ऐसा कुछ था ही नहीं। लेकिन जब मुझे पता चला कि वह तो मेरे प्रोफेशन को लेकर ही मेरे साथ जुड़ी है और प्रोफेशन के साथ-साथ उसके आकर्षण के लिए मेरे पास पल्सर बाइक का होना भी एक बहुत बड़ी वजह थी। मतलब यार अगर आपके पास एक पल्सर बाइक हो और उस वजह से कोई लड़की आपको चाहे, अस बात को मैं स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि जिसे मैं प्यार करता हूं उस लड़की की सोच इतने हलके स्तर की थी। उस दिन भिलाई से रायपुर तक लवी ने मुझसे इसलिए बात नहीं किया कि अपने दोस्तों से मिलवाने का सरप्राइज प्रोग्राम रखा था, जिसके जरिए वह स्थापित करना चाहती थी कि वह जिससे प्यार करती है वह वेल मेन्टेन्ड लड़का है, कोई ऐरा गैरा नहीं है। लेकिन जब मैं खटारा सीे दिखने वाली छोटी सी बाइक से पहुंच जाने पर उसे बहुत निराशा हुई और वह स्वयं को अपने दोस्तों के सामने अपमानित सी महसूस करने लगी। दोस्तों के सामने मेरे बारे में क्या क्या तारीफ नहीं की थी कि पायलट हैं कैप्टन हैं, लंबा चौड़ा हट्टा कट्टा स्मार्ट सा बंदा, मासूम चेहरा वगैरह…वगैरह।
उस दिन की घटना ने मुझे अंदर से झकझोर दिया और सोचने पर मजबूर कर दिया कि इतनी हलकी सोच वाले लोग भी इस दुनिया में होते हैैंं। यार पल्सर की वजह से नजदीकियां, मतलब यह तो पूरी तरह स्वार्थ हुआ और उस दिन से उसके प्रति मेरी भी सोच में कहीं न कहीं बदलाव आया। समय बीतता गया मेरी ट्रेनिंग दोबारा कब शुरू होगी, शुरू होगी भी या नहीं, यह भी सुनिश्चित नहीं हो पा रहा था। देखते-देखते उसका थर्ड ईयर कंपलीट हो गया और वह फाइनल ईयर में पहुंच गई। उस समय तक उसको भी समझ में आ गया था कि शायद मेरी ट्रेनिंग अब दोबारा शुरू नहीं होगी और क्योंकि ना तो मेरा ग्रेजुएशन पूरा हुआ है और ना ही मैं कोई बहुत बड़े फैमिली से बिलॉन्ग करता हूं, जहां बाप दादा की वजह से विरासत में छोड़ी गई बेतहाशा चल अचल संपत्ति मिली हो, ऐसा भी तो कहीं कुछ नहीं था। उस समय तक लवी को शायद यह बात समझ में आ गई होगी कि बलवंत के साथ रिश्ते को आगे बढ़ाने में कोई फ्यूचर नहीं है, बेहतर होगा कि यहीं से ही दूरी बना ली जाए और धीरे-धीरे उसने मुझसे दूरी बनाना शुरू कर दिया। लेकिन मैं उस दिन की खटारा बाईक वाली घटना के बाद से ही समझ गया था कि अब कोई मतलब नहीं क्योंकि जिस लड़की का मेरे प्रति आकर्षण की वजह मेरी शान और प्रोफेशन है, उससे इतर उसके सामने मेरी कोई हैसियत नहीं। जिस लड़की की सोच इस स्तर तक है जबकि मैं उसको लेकर भविष्य के ताने बाने बुनने लगा था यानि कितनी दूर तक सोच रहा था। फिर एक समय ऐसा भी आया जब उसने मेरे मुंह पर बोल दिया कि मेरे साथ उसका कोई भविष्य नहीं है और यह कि अब इस रिलेशनशिप को वह आगे कंटीन्यू नहीं कर पाएगी।
उसके मुंह से ऐसी बातें सुनकर मुझे बिल्कुल भी आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि मैं कहीं न कहीं यह महसूस कर चुका था कि एक न एक दिन तो ऐसा होना ही था। तब मैंने बिना कोई रोक-टोक, बिना कोई लड़ाई झगड़े के उसको अपनी जिन्दगी में आगे बढ़ने दिया और सामान्य दोस्त जैसे व्यवहार को यथावत् बनाए रखा। एक समय ऐसा भी आया जब धीरे-धीरे उससे संपूर्ण रुप से पूरा सम्पर्क समाप्त हो गया। वह अपने जीवन में आगे बढ़ी और मैंने अपना संघर्ष जारी रखा। लेकिन इस सफर में यह अनुभव तो हो गया था कि लोग आपसे तब जुड़ते हैं जब आप एक उगते हुए सूरज हों, अगर आप एक सितारा नहीं हो, अगर आप एक तड़क-भड़क का जीवन दे सकने में सक्षम नहीं हो तो लोग आपसे नहीं जुड़ते हैं। बात भी सही है, आखिर लोग आपसे क्यों जुड़ेंगे, कोई नहीं चाहेगा कि आपके साथ जुड़कर वह नकारात्मकता की तरफ जाए या फिर पहले से और कमतर हो जाए। तब मुझे एहसास हुआ कि लोग आपको आपके व्यवहार या अच्छाई से नहीं बल्कि आपके पूंजी से, आपके पद की हैसियत से व आपके शानो शौकत से आप से संबंध जोड़ना चाहते हैं। एक समय ऐसा था जब मेरे भीतर एक सेलिब्रिटी वाली फीलिंग थी और उसकी वजह से ही जीवन की रफ्तार एक चलचित्र की भांति आगे बढ़ रही थी कि अचानक उस फिल्म को बीच में ही खत्म करने में इस रिलेशनशिप ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। तब एहसास हुआ कि बलवंत जीवन में कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बशर्ते कि उसे पूरी निष्ठा और ईमानदारी से किया जाए, उसमें चोरी या मक्कारी ना हों, उसके बाद मैंने ठान लिया कि मैं हर वह काम करूंगा जिससे मुझे खुशी मिले चाहे वह छोटा हो या बड़ा। जिस काम को मैं कर सकूंगा, उसको अवश्य करूंगा और इसी सोच को जीवन का मूलमंत्र समझकर मैंने जीवन को एक नए सिरे से प्रारंभ करने के लिए खुद को समझाया और अनेक चुनौतियों को पार करते हुए आगे बढ़ता रहा। आज भी संघर्ष जारी है और मेरा ऐसा मानना है कि यह संघर्ष आगे भी बदस्तूर जारी रहेगा। इस संस्मरण को यहां प्रस्तुत करने की मुख्य वजह यही है कि वर्तमान समय में युवा पीढ़ी भौतिक संसाधनों के मायाजाल में उलझकर रह गई है और जिनके पास सर्वाधिक भौतिक सुख-साधन उपलब्ध हैं उन्हें ही सर्वशक्तिमान माना जाता है। लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि यह सब जीवन का एक छलावा है, वास्तविकता इससे बहुत दूर होती है। मैं युवा पीढ़ी से उम्मीद करता हूं कि भौतिकता के मक्कड़जाल से बचते हुए और जीवन की सच्चाई को समझते हुए जिन्दगी के महत्वपूर्ण निर्णय लेंगे।

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