घर तो मेरा पूरा गांव है, शहर तो मात्र एक सराय है

दीपावली के एक सप्ताह बाद कुमार आज शहर से गांव आया है। सामान्यतः सभी लोग कोई भी तीज-त्यौहार अपनों के बीच मनाना चाहते हैं और प्रमुख अवसरों पर तो दुनिया के किसी भी कोने से चलकर लोग अपनों के बीच पहुंचते हैं। लेकिन दीपावली जैसे प्रमुख त्यौहार के बीत जाने के एक सप्ताह बाद कुमार घर पहुंचा है। पढ़ाई करने अथवा रोजगार के सिलसिले में लोग शहरों का रूख करते हैं और खासकर नौकरीपेशा लोग अपनी जिम्मेदारियों में बंधकर रह जाते हैं जिसके कारण वे चाहकर भी इच्छानुसार छुट्टियां नहीं ले पाते हैं। कुछ ऐसी ही परिस्थितियां कुमार के साथ जुड़ी होने के कारण वह भी दीपावली पर गांव नहीं पहुंच सका और अब दीपावली बीत जाने के एक सप्ताह बाद वह गांव आया है।
कुमार ने लगभग 17-18 साल पहले शहर का रूख किया। हमारे देश के प्रायः ग्रामीण अंचलों के लोग पढ़ाई करने अथवा रोजगार की तलाश में शहरों का रूख करते हैं, इसमें कोई नई बात नहीं है। यहां पर नई बात यह है कि जो युवक अपने सुनहरे भविष्य के सपनों को साकार करने के लिए शहरों का रूख करते हैं, वास्तव में वे अपने ही नहीं बल्कि आस-पास के गांवों के युवाओं के लिए एक आदर्श बन जाते हैं। यदि किसी कारण से ऐसे युवक अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना गांव वापस आ जाते हैं तो उनके सुनहरे भविष्य की कल्पनाओं पर विराम तो लग ही जाता है, जिन युवाओं के लिए वे आदर्श बने होते हैं, उनका भी दिल टूट जाता है और आगे कुछ करने का जोखिम उठाने का साहस वे या उनके अभिभावक नहीं कर पाते हैं। बात 90 के दशक की है जब एक छोटे से गांव का कोई युवक पढ़ाई करने के लिए शहर जाता था तब उसके हमजोलियों के ऊपर विशेष प्रभाव पड़ता था और हमजोलियों के साथ ही उनके अभिभावकों के मन में भी अपने बच्चों के प्रति भविष्य के नए सपने हुआ करते थे क्योंकि गांव के एक युवक ने अन्य युवाओं को नई राह दिखाई थी और इसलिए वह उनका आदर्श बन जाता था। यदि ऐसा युवक लक्ष्य हासिल किए बिना ही वापस गांव आ जाता है तो एक साथ अनेक लोगों के सपनों पर ग्रहण लग जाने की संभावना बढ़ जाती है।
कुमार भी जो जिन्दगी में बहुत कुछ कर गुजरने के सपने संजोए हुए महाविद्यालयीन शिक्षा अर्जित करने व भविष्य संवारने का सपना लिए हुए शहर का रूख करता है। अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बलबूते जीवन में आए अनेक उतार-चढ़ाव से विचलित हुए बिना एक हद तक अपना मुकाम बनाने में कामयाब हुआ। हालांकि इस दौरान उसने जीवन की कटु सच्चाइयों को बहुत करीब से अनुभव किया लेकिन अपने हौसले को बनाए रखा। छुट्टियों के समय कुमार जब गांव वापस जाता था तब हमजोलियों के बीच एक अलग ही भौकाल होता था, उसकी विशेष आवभगत होती थी। एक तरह से ऐसी परिस्थितियां भी उसका मनोबल बनाए रखने में बहुत सहायक साबित हुईं। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान अनेक बार घरेलू परिस्थितियों में बदलाव हुए और कुमार ने महसूस किया कि शायद वह शहर में रहकर अब अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सकेगा। लेकिन हिम्मत न हारते हुए कुमार ने अपने लक्ष्य को सर्वोपरि रखा और एक समय दुकानों में पार्ट टाईम काम करते हुए किसी तरह अपने खर्च की पूर्ति करता रहा। कुमार एक मध्यम वर्गीय परिवार से था और महीने के जरूरी खर्चों की पूर्ति घर से हो जाया करती थी समय के खेल से एक बार तो वह भी पूरी तरह से टूट सा ही गया। लेकिन फिर स्वयं को संभाला और अपने लक्ष्य पर फोकस किया। लक्ष्य हासिल करने के लिए कुमार ने दिन रात मेहनत किया और अनेक प्रकार के छोटे-बड़े कार्यों को करते हुए अपनी पढ़ाई पूरी करने में कामयाब हुआ।
समय के साथ कुमार को शहर में रहते हुए सम्मानजनक नौकरी हासिल करने में कामयाबी मिली जिसमें मेहनत की तुलना में पारिश्रमिक तो अधिक नहीं कहा जा सकता लेकिन मान सम्मान और हर क्षेत्र में सम्पर्क का दायरा खूब बना। वास्तव में हर कोई जिस क्षेत्र में कार्यरत है, निष्ठा और ईमानदारी से कार्य करते हुए समाज में अपना अहम् मुकाम बना सकता है, इसमें संदेह नहीं। अनेक कठिनाईयों का सामना करते हुए कुमार को इस बात का सुकून है कि शहर में कार्य करते हुए उसने स्वयं का अपना एक छोटा सा आशियाना बनाने में सफल रहा।
गांव पहुंचकर कुमार के मानस पर चित्रपट की भांति बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं जब वह अपने हमजोलियों के साथ धमाचौकड़ी मचाते हुए गांव में घूमकर खूब मस्ती करता था। कभी पेडों पर चढ़कर जामुन तोड़ना तो कभी आम, कभी अमरूद तो कभी बेर आदि कभी खोखों कबड्डी खेलना तो कभी कँचे। इसी तरह की मस्ती करते हुए साल दर साल बीत जाया करते थे। पूरा गांव परिवार की भांति सभी बच्चों को भरपूर प्यार करता था और यही वजह थी कि जब भूख-प्यास लगी तो किसी भी काकी, दादी, भाभी, दीदी के घर में कुछ भी खाने अथवा छाछ दही, मट्ठा पीने को मिल जाता था। खेतों से कभी मटर तो कभी चना या फिर तिवरा उखाड़कर पेड़ की छांव में मित्र मंडली के साथ खाते तो कभी खेतों से गन्ना तोड़कर उसका आनंद उठाते। गांव में कहने को तो हर किसी का अपना घर-परिवार होता है लेकिन जिस तरह का भाईचारा और अपनापन गांव में मिलता है उससे हर कोई दावे के साथ कह सकता है कि घर तो मेरा पूरा गांव है। एक परिवार की तरह पूरे गांव के सभी सदस्य आपस में प्रेमभाव से रहते हैं और सुख-दुःख में एक दूसरे के साथ पूरी मुस्तैदी से खड़े रहते हैं।
दूसरी तरफ शहर में लोग अपना घर बनाकर परिवार के साथ रहते तो जरूर हैं लेकिन पड़ोसियों से भी मुलाकात महीनों तक नहीं हो पाती या यूं कह सकते हैं कि साल-दर-साल बीत जाते हैं लेकिन पड़ोस में कौन रहता है यह भी नहीं जान पाते। शहर की आपाधापी भरी जिंदगी व इंशानों की भीड़ में भी लोग अकेला महसूस करते हैं। शहर का अपना खुद का घर एक सराय जैसा ही लगता है जहां काम के सिलसिले में गए हुए लोग रात्रि विश्राम के लिए ठहरते हैं और सुबह फिर अपनी भागदौड़ की जिंदगी में मशगूल हो जाते हैं। कुमार सोचता है गांव की पगडंडियों से गुजरते हुए शहर पहुंचे थे फिर शहर में गांव से संदेशे आया कि बेटा त्यौहारों को शहर के कमरों में अकेले मत मनाना बल्कि गांव आ जाया करना। वास्तव में त्यौहारों को मनाने का जो उल्लास, उमंग, उत्साह और अपनों के बीच की खुशी गांवों में मिलती है, वह शहर के कमरों में कभी हासिल नहीं हो सकती।
कुमार ने इस अनुभव से महसूस किया है कि शहर में बनाया हुआ हर किसी का अपना मकान एक सराय अथवा विश्रामगृह जैसा ही है जिसमें उन्हें अपनों से दूर रात्रि विश्राम की सुविधा तो मिल जाती है लेकिन चित्त अपनों को ही खोजते रहता है। अपनापन और सुख-दुःख में मानसिक सम्बल तो अपनों से ही मिल सकता है। बड़ी उपलब्धि पर खुशी बांटने के लिए लोग अपनों को खोजते हैं तो दुःख की घड़ी में रोने के लिए लोग कंधा भी खोजते हुए नजर आते हैं जो शहर के सरायनुमा घर में नसीब नही हो सकता। लेकिन अफसोस दोनों ही परिस्थिति में शहरी कांक्रीट के जंगल में सब बेगाने ही नजर आते हैं, अपना कोई दिखाई नहीं पड़ता। इसके लिए जरूरी है कि हम अपने गांव के सम्पर्क में बने रहें, वहां से अलग रहकर पेड़ से कटी हुई टहनी के समान हो जाएंगे जिसका अपना कोई वजूद नहीं होता। बुजुर्गों ने ठीक ही कहा है कि ‘चिड़िया आसमान में कितनी भी ऊचाईयों तक उड़ ले लेकिन चारा तो उसे धरती पर ही मिलेगा‘। कुमार कहता है कि दुनिया के किसी भी कोने में रहो, भरपूर उन्नति और तरक्की करो, सोहरत नाम और पैसा खूब कमाओ लेकिन अपने गांव, अपनी मिट्टी, अपनी जड़ व अपने लोगों से कभी कटकर मत रहना क्योंकि वहीं से तुम्हारी अपनी पहचान जुड़ी है, वहीं से तुम्हारा अपना वजूद है।
                                                                                                  ©️ एम बी बलवंत सिंह खन्ना

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