तस्मै श्री गुरूवे नमः शिक्षक दिवस पर विशेष, व्यक्तिगत अनुभव

1 जुलाई से ही विद्यालय की कक्षाएं प्रारम्भ हो गयी थीं साथ ही ग्रामीण परिवेश की जीवन शैली भी। बाबू जी आज कुछ मजदूरों के साथ खुद भी घर के छान्ही (खपरैल की छत) पर खपरैल को सुधार रहे थे चूँकि गाँव में बरसात के शुरू होने से पहले हर घर का यह सामान्य सा किन्तु महत्वपूर्ण कार्य होता था। आंधी तूफ़ान से छत के खपरैल अपनी जगह से खिसक जाया करते थे जिससे घरों में पानी टपकने की समस्या होती थी। उससे बचने के लिए बारिस से पहले ही छान्ही का सुधार कार्य करवाना आवश्यक होता था। मैं कई दिनों से सोच रहा था की अपनी विद्यालयीन शिक्षा के लिए बाबू जी से बात करूँगा, बात इसलिए करना था क्योंकि मैं अब कक्षा 11 वीं में प्रवेश करने वाला था अगर कक्षा 10वीं तक की पढ़ाई की बात करूँ तो मैंने कक्षा पहिली से लेकर कक्षा 5वीं तक गांव के ही शासकीय विद्यालय में अध्ययन किया था।
उस समय विद्यालय में केवल 2 ही मास्टर जी हुआ करते थे, एक छोटे गुरुजी और दूसरे बड़े गुरूजी जिनमे छोटे गुरूजी ऐसे थे जो गलती करने पर हमे नाभि को मरोरड़ते हुए पकड़कर दीवाल पर उठा देते थे। यही उस समय हमारी शैतानियों के लिए सबसे बड़ा दंड हुआ करता था। उसके बाद कक्षा 6वीं से लेकर 9 वीं तक बाबू जी लोगों द्वारा गठित समिति के माध्यम से संचालित विद्यालय में शिक्षा प्राप्त किया। चूँकि पिछले वर्ष बोर्ड परीक्षा केंद्र के लिए पास के क़स्बा ससहा में स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय को मान्यता नहीं मिल पाई थी, इसलिए गांव में संचालित विद्यालय को अचानक बंद करना पड़ा। तब मैंने कक्षा 10वीं की पढ़ाई ससहा स्थित शासकीय विद्यालय से ही किया। अब 10वीं के बाद आगे की पढ़ाई मुझे गणित विषय से करना था लेकिन उस विद्यालय में गणित संकाय नहीं होने के कारण मुझे पामगढ़ के किसी विद्यालय में दाखिला लेना था और इसी बात की अनुमति के किये बाबू जी से बात करने के लिए कई दिनों से प्रयासरत था जिसे आज पूर्ण करने की ठान रखा था।
तब बाबू जी छान्ही पर थे और मैं मौके का फायदा उठाते हुए नीचे खड़ा होकर बाबू जी से बात करने लगा और अपनी इच्छा प्रकट की बाबू जी हमेशा शिक्षा के प्रति हम चारो भाई बहनों को जागरूक रखे रहे। उन्होंने एक सुर में अपनी सहमति दे दी और पूछे कितनी राशि की जरुरत होगी। मैंने कहा बाबू जी अभी दाखिला मात्र के लिए 500 रूपये उसके बाद 50 रूपये मासिक शुल्क की जरूरत होगी और कॉपी पुस्तक के लिए अलग से। बाबू जी छान्ही सुधार के लिए मजदूरो को देने के लिए 500 रूपये नगद रखे थे, उस राशि को मुझे देते हुए कहा जाओ अभी दाखिला ले-लो फिर आगे की व्यवस्था करता हूँ। हम अत्यधिक अमीर नहीं थे, तब स्थिति ऐसी थी कि घर पर जब कभी मेहमान आ जाये तब ही घर पर दाल पकाई जाती थी। चूँकि बाबू जी शिक्षा के महत्व को बखूबी समझते थे इसलिए घर में पढ़ाई को लेकर माहौल सकारात्मक हमेशा से ही सकारात्मक रहा है। मैंने उसी दिन बस पकड़ी और पामगढ़ के तत्कालीन प्रसिद्द विद्यालय विद्या निकेतन मॉडल कान्वेंट स्कूल आ गया और बिना देरी किये कक्षा 11वीं में दाखिला ले लिया।
विद्या निकेतन स्कूल में ही दाखिल इसलिए लिया क्योंकि पढ़ाई की दृष्टि से उस समय 2005 में पामगढ़ में मेरी जानकारी के अनुसार 2 ही विद्यालय अच्छी थे, एक विद्या निकेतन मॉडल कान्वेंट स्कूल और दूसरा ज्ञान ज्योति उच्चतर माध्यमिक शाला। विद्या निकेतन में मेरे यहाँ बुआ और परिवार से कई भाई बहन भी पढ़ रहे थे, इसलिए वहाँ दाखिला लेना मैंने उचित समझा।
तब गांव की पढ़ाई और नगर के स्कूल की पढ़ाई में काफी अंतर होते थे। गांव के विद्यालय में जहाँ तब हिंदी भी ठीक से नहीं सीख पाये थे और जहाँ 6वीं कक्षा में जाने पर पहली बार अंग्रेजी का ।ए ठए ब्ए क् पढ़ने को मिला था, वहाँ से निकल कर सीधा कान्वेंट स्कूल में पढ़ाई करना मेरे लिए कठिन था। जहां गांव के स्कूल में भले ही हिंदी या अंग्रेजी में कमजोर रहें होंगे लेकिन एक बात तो थी कि हमें मौलिक शिक्षा गांव के स्कूल से ही प्राप्त हुई थी, और यह विद्या निकेतन में भी परस्पर जारी रहा जहाँ विषयगत ज्ञान के अलावा मौलिक शिक्षा भी पूरी मिली जो आज पर्यन्त तक जीवन में विद्यमान है। तब विद्या निकेतन में हमारे स्कूल के संचालक एवं प्राचार्य थे श्री नरेंद्र पाण्डेय सर, जिन्होने कितने हजार विद्यार्थियों के जीवन में मौलिक शिक्षा का प्रसार किया है, यह शायद उनको भी पता नहीं होगा।
श्री पाण्डेय सर स्कूल में सभी विद्यार्थियों को एक अभिभावक की भांति शिक्षा देने से लेकर पालक कीे तरह ही आर्थिक मदद के लिए भी जाने जाते हैं। तब के समय में हमारे लिए सकारात्मक वक्ता हमारे नरेंद्र पाण्डेय सर ही हुआ करते थे। विद्यार्थी कक्षा में जब बहुत बदमाशी कर रहे हों, खाली क्लास में हल्ला कर रहे हों तब पाण्डेय सर द्वारा बिना किसी चिड़चिड़ाहट के बड़े ही प्यार से समझाना हम सभी के लिए एक टॉनिक का काम करता था। मैंने 11वीं एवं 12वीं की पढ़ाई विद्या निकेतन से ही पूर्ण किया और इन दो वर्षाे में मैंने कभी भी पाण्डेय सर को बच्चो पर गुस्सा करते नहीं देखा था। विद्यार्थी जीवन में स्कूल के आखिरी दिनों की याद हर व्यक्ति के जीवन की अनमोल यादें होती हैं। इस लेख को पढ़ने वाले आप सभी के जीवन में यह पल अवश्य आया ही होगा। स्कूल में हम अलग अलग विषयों के अलावा मौलिक शिक्षा, नैतिक शिक्षा भी प्राप्त करते हैं, इसके बाद भी सबसे ज्यादा बदमाशी भी हम सबने स्कूल के समय में ही किए होते हैं। वर्तमान के प्रतिस्पर्धी काल में शायद यह सब कहीं विलुप्त सा हो गया है। मुझे मेरा बचपन बहुत याद आता है, वे शिक्षक याद आते हैं, उन शिक्षको की शिक्षा और डांट फटकार याद आती हैं। जीवन में चाहे जितनी तरक्की मिले कितनी भी उचाईयों पर पहुंच जाएँ, लेकिन पहिली से लेकर 12वीं तक की शिक्षा का जीवन में जो स्थान है, वह शायद ही किसी और चीज के लिए होगा।
वास्तव में देखा जाए तो महाविद्यालयीन शिक्षा कैरियर को लेकर आगे बढ़ने में मददगार होती है जिससे जीवन को एक नई दिशा मिलती है। लेकिन विद्यालयीन शिक्षा के दौरान विद्यार्थियों की जो बुनियाद बनती है वह जीवन के हर मोड़ पर सार्थक साबित होती है। विद्यार्थियों की बुनियाद को मजबूत करने वाले, संस्कार देनेवाले उन सभी शिक्षकों को आज शिक्षक दिवस के अवसर पर शत्-शत् प्रणाम, जिनकी शिक्षा की बदौलत जीवन के इस मोड़ तक आज मैं पहुच सका हूँ।

बलवंत सिंह खन्ना
स्वतन्त्र लेखक, कहानीकार

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2 thoughts on “तस्मै श्री गुरूवे नमः शिक्षक दिवस पर विशेष, व्यक्तिगत अनुभव

  1. मुझे मेरे स्कूल के दिन याद आ गए…
    बहुत ही सुंदर वृत्तांत लिखा है आपने👍

  2. Aapko bhi Shikshak diwas parajay shat naman bhaiya… Bahut achcha lekh to h hi bhaiya or ab blog ka font or colour bhi achcha h.

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