गांव, बिन पीपल पेड़

गाँव शब्द सुनते ही मन में सुकून की लहर दौड़ पड़ती है, जहां प्राकृतिक संसाधन के साथ मानव व्यवहार में अपनत्व का मिठास घुली होती है। गाँव जहां खेतखलिहान, नदीतालाब, अमरैया का छाँव, जहां बरगद और पीपल का पेड़ अपनी जटा फैलाए खड़े होते हैं। आप और हममें से किसी ना किसी पीढ़ी ने गाँव से ही अपने जीवन की शुरुवात की होगी। पर आज वैश्वीकरण के इस दौर में रोज़गार के लिए गाँव से शहरो की ओर पलायन बढ़ा है। इन्ही घटना क्रम के बाद आज कई गाँवों में बरगदपीपल के पेड़ नदारद हो रहे हैं। बिना पीपल पेड़ के क्या स्थिति हो सकती है हमे समझना होगा। यह कहानी भी ऐसे ही एक गाँव की है, जहां अब पीपल के वृक्ष नहीं दिखते हैं। बात उस समय की है जब साहिल ने इलाहाबाद में मां गंगा के पवित्र जल पर अपने दादाजी के अस्थि विसर्जन कर वापस आकर अपने गांव के बस्ती से दूर मैदान पर निर्मित बड़े तिरपाल से बंबू नुमा स्थान पर रुका हुआ है।

दादाजी अर्थात सामाजिक रूप से वैभवशाली व्यक्तित्व एक सफल जीवन जी कर 87 साल के उम्र में स्वर्गवास कर गए थे। दादा जी के पीछे उनका बड़ा संयुक्त परिवार है। साहिल का गाँव लगभग 2000 आबादी वाला छोटा सा गांव है, जहां आज भी यह मान्यता है कि अपने कोई भी इष्ट जब स्वर्गवास कर जाता है तब उसके अस्थि का विसर्जन मां गंगा को अर्पण करने से स्वर्ग लोक प्राप्ति के साथ ही मृत आत्मा को शांति प्राप्त होती है। चूँकि साहिल के दादाजी सामाजिक और विकासशील विचारों के थे। उनके स्वर्गवास के पश्चात परिवार के सभी सदस्यों ने इच्छा जताई कि दादा जी के व्यक्तित्व के अनुरूप उनको सम्मानजनक विदाई दिया जाये एवं उनके अस्थि को प्रयागराज में मां गंगा के पावन जल में विसर्जन किया जाए। सभी के इच्छाओं के अनुरूप साहिल अपने पिताजी और अपने बड़े पिताजी तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ इलाहाबाद में माँ गंगा में दादा जी के अस्थि को प्रवाह कर तीन दिन के यात्रा के पश्चात आज वापस अपने गांव लौटा है।

पहले और आज भी गांव में ऐसी मान्यताएं हैं कि गंगा में आप किसी अपनो के अस्थि विसर्जन करके आते हैं तो सीधे घर पर प्रवेश नहीं करते। बल्कि आप बस्ती से कुछ दूरी पर रुकते हैं वहीं पर आप भोजनपानी करते हैं। उसके बाद आपके घर के सदस्य, गांव, समाज के लोग आपको लेने जाते हैं। कहते हैं कि गंगा में अस्थि विसर्जन के लिए गए हुए व्यक्ति के साथ में वहां से कई देवतुल्य शक्ति साथ में वापस गाँव आती हैं। देव तुल्य शक्ति जो हमारे पूर्वज ही होते हैं। इलाहाबाद में पिंडदान पूजा के लिए पांडा होते हैं जिनके पास आज भी हमारे कई पीढ़ी की जानकारी संरक्षित है। आप अपने पूर्वजों के बारे में उन पांडों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं वही से पूर्वजों की देवतुल्य आत्माएँ साथ आती ऐसी मान्यताएँ हैं। माँ गंगा से साथ में गाँव आये हुए शक्तियों को पूजा अर्चना करके ससम्मान पुनः देवलोक भेजा जाता है। ऐसी मान्यताएं प्रचलित में है और इस मान्यता का पालन करने के लिए सदस्यों को बस्ती से दूर मैदान पर रोकने की परंपरा रही है। तब घर से खीर या फिर अन्य प्रसाद बनाकर पूरे समाज परिवार रिश्तेदार के साथ भजन कीर्तन करते हुए वापस घर पर प्रवेश कराया जाता है। पहले जब वन संपदा अधिक और गांव पर मकान कम हुआ करते थे तो गांव को बड़ेबड़े वृक्षों से आच्छंदित पाया जाता था। साहिल के गांव में भी घर से कुछ दूर पर ही 100 मीटर चौड़ाई और लगभग 3 से 400 मीटर लंबाई का मैदान हुआ करता था जहां शुरू से लेकर आखिर तक बरगद और पीपल के चार बड़ेबड़े वृक्ष हुआ करते थे।

साहिल अपने दादाजी को याद करते हुए गहन मंथन एवं चिंतन पर खोया हुआ है, जिस गांव पर बरगद और पीपल का भरमार हुआ करती थी आज उस मैदान पर एक भी बरगद या पीपल का पेड़ नहीं है। साहिल अपने अतः मन गाँव को याद कर के विचार करता है तो पाता है कि केवल उस मैदान में ही नहीं अपितु पूरे गांव में अब पीपल या बरगद का वृक्ष मौजूद नहीं है। जिस पीपल पेड़ के नीचे कभी कई सदस्य या फिर ऐसे कई परिवार अपने करीबियों के अस्थि विसर्जन करके आने के पश्चात छांव के नीचे विश्राम किया करते थे। आज उसके बदले एक तिरपाल के सहारे निर्मित छाव पर विश्राम कर रहे हैं। यह सोचकर साहिल का मन बहुत अधिक व्यथित था। गाँव में पहले जहां चौक चौराहों का नाम वृक्षों से हुआ करता था नीम चौरा, बरगद चौरा, पीपल चौरा अब ना तो वह चौक रहा और ना ही वृक्ष। जिस गांव पर वृक्षों की संख्या अधिक हुआ करती थी आज नदारत हो गए हैं। यह कहीं ना कहीं हम मानव जाति का ही अभिशाप है जो वन संपदा का अंधाधुन दोहन करते आए हैं, अपने बीते हुए सालों को याद करते हुए साहिल आज यह प्रण लेता है की 87 साल के उम्र में दादाजी का स्वर्गवास और वर्तमान में मेरी उम्र 21 साल कुल मिलाकर 108 वर्ष। दादा जी को सच्ची श्रद्धांजलि तब ही मिलेगी जब गाँव में फिर से बड़ेबड़े पीपल, बरगद के वृक्ष अपनी जटा फैलाए मिले। साहिल यह प्रण लेता है कि 108 पीपल और बरगद का वृक्ष अपने गांव में रोपित करूँगा, रोपित ही नहीं अपितु उसको बड़ा होते तक संपूर्ण देखभाल करूंगा ताकि भविष्य में जब मैं दादा के उम्र का रहूंगा तो मेरे स्वर्गवास पर मेरे पोते या फिर मेरे परिवार के सदस्यों को यूं बंबू के सहारे ना रहना पड़े और कोई गाँव बिना पीपल, बरगद पेड़ ना रहे।

लेखकबलवंत सिंह खन्ना
स्वतंत्र लेखक एवं कहानीकार

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