व्होल फैमिली ऑन डाइनिंग टेबल और पिता जी की सीख

वक्त का ये परिंदा रुका है कहाँ,
मैं था पागल जो इसको बुलाता रहा।
चार पैसे कमाने मैं आया शहर,
गाँव मेरा मुझे याद आता रहा ।।
-जसवंत सिंह साहब….

आज विजय को बाबू जी की आँखों में आंसू के साथ सुकून दिख रहा था और गुरुर भी। गुरुर इस बात का कि 2000 की जनसँख्या वाले छोटे से गांव से गांव से निकल कर उनका लड़का प्रदेश की राजधानी में 15 वर्ष संघर्ष कर के आज खुद का मकान जो बनवा लिया था। वैसे तो विजय ने 12वीं कक्षा की स्कूली पढ़ाई के बाद आगे की शिक्षा प्राप्त करने शहर प्रस्थान किया था। शिक्षा के साथ ही जीवन के तमाम उतार चढ़ाव का सामना करते हुए आज पूरे 15 वर्ष हो गए थे। इस बीच विजय ने कई अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग कार्याे का अनुभव लिया। यही विवाह किया, सभी सुख दुःख देखते हुए जीवन गतिमान रहा। यूँ तो गांव में उनकी ठीकठाक कोठी (बड़ा घर) है, लेकिन शहर में उसने 15’12 फिट वाले किराये के कमरे से रहना शुरू किया था और आज 2000 वर्ग फुट के प्लाट में 1500 वर्ग फुट पर खुद की पसंद का मकान बनवा लिया था, जिसका आज विधिवत गृह प्रवेश हुआ। आज इस अवसर पर उसके परिवार के सभी सदस्य, नाते रिश्तेदार एवं दोस्त यार पधारे थे। सभी शुभकामनाएं देते हुए वापस भी चले गये। चूँकि गाँव काफी दूर है इसलिए परिवार के सभी सदस्य रात रुककर कल जाने की योजना बनाये। विजय ने 5 कमरो के साथ हाल और बालकनी वाले ठीक ठाक सामान्य से घर को जितना हो सका सुसज्जित करने का प्रयास किया था। पूजा पाठ एवं तमाम कार्याे के निष्पादन के बाद अब रात्रि भोजन का समय हो गया था। विजय की माँ जी, बाबू जी के साथ भईया, भाभी, दीदी, जीजा और बच्चे सभी थे। वैसे तो खाने के लिए डाइनिंग टेबल पर्याप्त था लेकिन बाबू जी का विशेष आदेश था कि आज सभी लोग जमींन पर बैठकर ही खाएंगे। चूँकि उनके आदेश का पालन करना विजय का कर्तव्य है, इसलिए उनके कहे अनुसार विजय ने सारी व्यवस्था कर रखी थी। 3 भाईयों और 2 बहनों में विजय सबसे छोटा भाई है, इसलिये उसपर सभी का प्यार ज्यादा था। बाकि दोनों भईया और दीदी लोगों का भी अलग अलग शहर में स्वयं के घर पहले ही हो चुके थे। सभी शासकीय पदों पर अधिकारी जो ठहरे लेकिन बाबू जी विजय के लिए चिंतित रहते थे जो शायद आज दूर हो गया। सभी भाईयों में बस विजय ने व्यवसायिक क्षेत्र में अपना भविष्य आजमाया बाकी दोनों भाई प्रसाशनिक अधिकारी हैं।
वैसे तो बाबू जी ने कक्षा 8वीं तक की ही पढ़ाई किया था, लेकिन शिक्षा को लेकर उनकी सोच स्पष्ट रही है। उन्होंने हमेशा सिखाया की किसी भी परिवार को सफल बनाने के लिए किसी एक पीढ़ी को त्याग, बलिदान, मेहनत व संघर्ष करना ही पड़ता है, फिर आगे की पीढ़ी के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपनी विरासत को कहाँ तक ले जाती है। चूँकि उनके पिता जी यानि की विजय के दादा जी ने स्कूली शिक्षा के साथ ही घरेलू कार्याे की देखभाल में भी पिता जी को भी लगाए रखा, उस वक्त उनकी जमींदारी जो थी। लेकिन कई बार के अकाल और भुखमरी में उनकी जमींदारी भी चली गयी थी, लेकिन उनके पिता जी ने इस बात को अच्छे से समझ लिया था और उनकी हर संभव कोशिश थी कि आने वाली पीढ़ी को ऐसी किसी त्रासदी का सामना न करना पड़े। इसलिए उन्होंने सभी बच्चों की पढ़ाई पर विशेष जोर दिया। इसके लिए माता-पिता दोनों ने ही काफी त्याग किये। त्याग इस बात का की अब सभी बच्चे गांव में नहीं शहर में रहते हैं। सभी बच्चे मिलकर घर में सुविधाओं की सारी चीजें तो उपलब्ध करा देते हैं लेकिन गांव में माता पिता को ज्यादा समय नही दे पाते हैं। आज विजय ने भी बाबू जी से कहा कि आप दोनों मेरे साथ रहिए यहीं शहर में, लेकिन बाबू जी नहीं माने। उन्होंने विजय से कहा कि बेटा मैं तुम्हारे लिए चिंतित रहता था आखिर आज शहर में तुमने भी विजय पा लिया है रोटी, कपड़ा और मकान के साथ शिक्षा जीवन के आधार है और तुमने इसमें सफलता हासिल किया है आगे और तरक्की करो मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है बेटा इसके अलावा मैं आज तुम सभी से कहना चाहता हूँ कि अपनी आने वाली पीढ़ी की बेहतरी के लिए जिस एक पीढ़ी को त्याग बलिदान देने की बात मैं हमेशा करता था वो पीढ़ी मैं ही हूँ। तुम सभी को आज आत्मनिर्भर देखकर मुझे बेहद खुशी हो रही है। आज मेरे सभी बच्चे अपने-अपने कार्य क्षेत्र में सफल हैं, यही मेरी सबसे बड़ी सफलता और पूंजी है। अब तुम्हारी माँ के साथ मैं अपने जीवन के आखिरी समय तक गांव में ही रहूँगा और तुम सभी से यह उम्मीद जरूर रखूँगा कि चाहे कुछ भी हो जाए अपने आधार अपनी जड़ों से कभी दूर मत होने देना और न ही खुद को दूर करना। गांव है तो हम हैं, हमारी नैतिक और मौलिक समझ गांव की ही देन है। इसलिये जब भी समय मिले गांव में समय जरूर बिताना, वहाँ तुम्हे अपनी जड़े मिलेंगी जहाँ से सिंचित होकर तुम सभी यहाँ तक पहुचे हो। बाबू जी की बातों में आज काफी गहराई थी जिसे हम सभी महसूस कर पा रहे थे। उनके द्वारा दी गई शिक्षा और संस्कार ही आज उन सबको ऐसे मुकाम तक पहुचा पाई थी। गावों से जिस प्रकार युवाओं का पलायन हुआ है, चाहे वह शिक्षा के लिए हो या रोजगार के लिए, इससे कहीं न कहीं गांव का ही नुकसान हुआ है। हम अपना भविष्य बनाने कीे होड़ में अपने आधार को छोड़़ रहें हैं। इस कहानी में विजय ने तो विजय हासिल कर लिया लेकिन गांव से उसका परिवार अब शहर में बस गया। आज एक और परिवार ने अपना स्थायी पता बदल लिया था।

बलवंत सिंह खन्ना
स्वतन्त्र लेखक, कहानीकार, हिंदी साहित्य विचारक

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8 thoughts on “व्होल फैमिली ऑन डाइनिंग टेबल और पिता जी की सीख

  1. अपने अपने जगह सब सही है…..
    गांव हो या शहर जीवन जीने का सही सलिखा ही आने वाले पीढ़ी का जीर्णोद्धार करता है । और एक बात समझ से परे है कमाने और तरक्की के लिए घर छोङना ही पड़ता है क्या…?

  2. आज भी गांव सा सुकून , इस शहर के चार दिवारी में भी नहीं है,,,। लेकिन रोजगार की तंगी को इसी ने पूरा किया और आज फिर एक गांव शहर में बस गया….।।

  3. बहुत सुंदर लेख है,,,चाहे हम कही भी जाए,,,बड़े अफसर bussisman,,, प्रशासनिक अधिकारी बन जाए,,अपने आधार ,,,अपने पैरेंट्स ,,,अपने गांव से जुड़ा होना ही चाहिए,,,,परिवार को समय देना ही चाहिए बहुत खुशी मिलती है,।ऐसे ही आप लिखते रहे शुभकामना आपको

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